Monday, May 29, 2017

दूसरी औरत ..... अंतिम भाग

जब भी रात में जुगनु चमकते, जब भी भंवरे फूल पर मचलते, जब भी चांद बादल में छिपता, जब भी चांदनी छिटकती, जब भी शमां पर परवाना मचलता, जब भी मौजें बेकरार होकर उबलने लगतीं, नजमा को बस उसकी मोहब्बत याद आती।

गाड़ी की स्पीड सौ के पार जा रही थी। कभी अचानक से नजमा गाड़ी पर ब्रेक लेने लगती तो कभी अपनी ही रौ में चली जाती। लेकिन कब तक चलता ये सिलसिला। कहीं तो रूकना था ना उसे। पर कहां इससे तो वो बेखबर ही थी। तभी उसने गौर किया कि बड़ी बेसब्री से लोग आसमां पर नजर गड़ाए थे। गाड़ी साइड में पार्क की और नजर उठाई तो देखा चांद निकल आया। हां ये कोई मामूली रात नहीं थी। मुकद्दस रमजान की दस्तक थी। दुआ में हाथ उठे। बचपन से ही सुना था कि चांद देखकर मांगी गई मन्नत पूरी हो जाती है। जब से रेहान जिंदगी में आया था, उसकी खुशियों के सिवा कुछ और मांगा ही नहीं था। पांच बरस बीत गए उससे अलग हुए और सुहैल की जिंदगी में शामिल हुए। उसने कुछ नहीं मांगा। फिर आज अचानक दुआं के लिए हाथ कैसे उठ गए। क्या मांगें और किसके लिए? खुद तो आज वह आजाद हो गई थी हर बंधन से। हालांकि आजाद तो पहले भी थी। हां थी ही क्यूंकि सुहैल ने कोई बंदिश कहां लगाई थी उसपर। आज अलग था कुछ तो उसकी सोच। क्यूंकि असल में आज वो आजाद नहीं हुई थी। बल्कि खुद को खुशियों से हर तरह से दूर रखने की तैयारी कर चुकी थी।
उधर सुहैल मियां छत पर चांद का दीदार कर दुआ में अपनी बेगम साहिबा नजमा की सलामती और खुशियों की फरियाद कर रहे थे। तभी उनका मोबाइल बज उठा। दौड़कर देखा, सोचा कहीं नजमा की कॉल न हो। लेकिन फोन उनके दोस्त ने रमजान की मुबारकबाद देने के लिए किया था। सुहैल मियां फोन हाथ में लिए ही दरवाजे पर बैठ गए। जानें किसका इंतजार था। और नजमा ने तो कहा भी था कि वह अब नहीं लौटेगी। अब वह आजाद है, अब वह जिंदगी की हर खुशी को महसूसना चाहती है। क्यूंकि उसे तो प्रायोरिटी पसंद है। तभी उसके मन में भी कुछ सवाल कौंधे! मैंने कब उसे इग्नोर किया। मैं तो उसकी एक मुस्कुराहट पर दुनियां वार देता। कहां चूक हो गई। शायद मैं ही इस काबिल न बन सका कि नजमा अपने प्यार को भुलाकर मेरी बन पाती। इसी उधेड़बुन में सुहैल को जाने कब नींद आ गई।
लेकिन नजमा की आंखों में नींद नहीं थी। क्यूं नहीं थी वह भी नहीं समझ पा रही थी। शहर से तो बहुत दूर निकल चुकी थी। रात काफी हो चुकी थी। सो उसने रास्ते में ही एक होटल में रूकना मुनासिब समझा। ताकि कहां जाएगी और क्या करेगी इसके बारें में तो सोच ले। बहुत थक गई थी। लेकिन नींद आंखों से गुम थी। एक ही ख्याल में खोई थी कि इस वक्त सुहैल क्या कर रहा होगा। क्या खत पढ़ा होगा। फिर क्या कॉल की होगी। तभी याद आया कि उसने तो फोन बंद कर रखा है। तुरंत ही फोन ऑन किया और नोटिफिकेशन चेक करने लगी कहीं सुहैल मियां ने कुछ मैसेज या कॉल तो नहीं की। लेकिन ऐसा कोई नोटिफिकेशन नहीं था। अच्छा, तो उन्हें भी मुझसे आजादी ही चाहिए थी। क्या बात है शौहर साहब! मुस्कुराते हुए खुद से ही बात करने लगी।
नजमा ने गुलाबी डायरी उठाई और लिखने के लिए पन्ना खोला ही था कि रेहान के नाम पर हाथ फेर कर कलम वापस मेज पर ही रख दी। सोचने लगी कि इतने बरस बीत गए। उसने सुध भी नहीं ली। हां जब आखिरी बार उससे मुलाकात हुई थी तो कहीं कोई देख न ले इस डर में उसने नजमा का हाल तक नहीं पूछा। बस दोनों की नजरें टकराई थीं। कहीं होता है ऐसा कोई बेइंतहा मोहब्बत करने का दावा करे और यूं भूल जाए। लेकिन पांच बरस पहले तो ऐसा ही हुआ था। उसके बाद नजमा कैसे जी रही थी। इस बारें में रेहान ने न तो कभी जानने की कोशिश की और न ही कभी नजमा ने बताने की। उसे लगा था कि सबकुछ भूलकर वह भी जिंदगी में आगे बढ़ जाएगी। लेकिन ऐसा हो न सका। जब भी रात में जुगनु चमकते, जब भी भंवरे फूल पर मचलते, जब भी चांद बादल में छिपता, जब भी चांदनी छिटकती, जब भी शमां पर परवाना मचलता, जब भी मौजें बेकरार होकर उबलने लगतीं, नजमा को बस उसकी मोहब्बत याद आती। हां तभी तो सुहैल के लाख जतन के बाद भी वह उसे अपना नहीं पाई थी। पर जो भी हुआ उसमें उनका क्या कसूर था। उन्हें किस बात की सजा मिली। तभी नजमा के कमरे में रखा फोन घनघना उठा। मैडम कॉफी और तो नहीं चाहिए। हम्म। एक कप और भिजवा दीजिए।
हाथ में कॉफी मग लिए खिड़की के पास बैठी नजमा सोचती रही कि सुहैल मियां की हर चाहत, हर ख्वाहिश नजमा से है। उन्होंने तो उसकी मर्जी के बिना कभी छुआ तक नहीं। न सिर्फ मोहब्बत बल्कि यकीन भी दिया। पांच बरस में हर दिन हर पल नजमा की मर्जी से ही तो चल रहे थे। सुहैल को उसने क्या दिया? जब इस सवाल पर पहुंची तो जवाब नहीं था। और आज जब माह-ए-पाक रमजान की शुरूआत हुई। जब खुदा की नेमतें और बरकतें बरसने का दौर आया तो वो सुहैल को जिंदगी भर का गम दे आई। आखिर क्यूं? कहीं वो उसे चाहने तो नहीं लगी। नहीं-नहीं ऐसा कैसे हो सकता है। मोहब्बत तो बस एक बार होती है। दिल पर गर किसी का नाम लिख जाए तो फिर कोई और नाम नहीं लिखता। जिसपर ये रंग चढ़ जाए तो कोई और रंग नहीं फबता। और आज तो नजमा ने सबकुछ रेहान की पसंद का पहना था। सफेद मलमल का कुर्ता, उसपर गुलाबी चुन्नी, हाथों में कंगन, आंखों में काजल और होठों पर लाली। सब उसी की पसंद का तो था। फिर ये उलझन कैसी। कॉफी मग मेज पर रखते हुए नजमा वॉशरूम की तरफ दौड़ी। आंखों का काजल, होठों की लाली मिटा दी थी। हाथों का कंगन उतार दिया था। सफेद मलमल के कुर्ते की जगह लाल रंग का कुर्ता पहना। वहीं जिसपर सुहैल मियां कहते थे कि काजल, लाली और कंगन के श्रृंगार के बिना भी आपपर यह रंग बहुत जंचता है। बला की खूबसूरत लगती हैं आप। क्या है ये और यह सब क्यंू कर रही है वो? उसे तो आजादी चाहिए थी न किसी के भी सफेद और लाल रंग से। किसी भी रिश्ते से। अब तो वह उड़ना चाहती थी। फिर क्यूं सुहैल बार-बार याद आ रहा था। क्यूं दुआं के लिए हाथ उठे थे आज। ऐसे ही तमाम सवालों में उलझ गई थी नजमा और कुर्सी पर बैठे-बैठे ही जाने कब नींद के आगोश में चली गई।
सुबह जैसे ही आंखें खुली। नजमा ने बैग उठाया और कार शहर की ओर मोड़ दी। इस बार स्पीड नॉर्मल थी। दरवाजे पर पहुंचकर दस्तक देने को हाथ बढ़ाया ही था कि सुहैल मियां वहीं चौखट पर ही लेटे नजर आए। अल्लाह! इतना बड़ा गुनाह करने से बचा लिया आपने। ऐसे नेकदिल शौहर का दिल दुखाकर तो हमें दोजख में भी जगह न मिलती। ये क्या करने जा रहे थे हम। हमें माफ करें। इस फरियाद के साथ नजमा ने सुहैल को आवाज लगाई शौहर साहब अफ्तारी न कीजिएगा। उसने जैसे ही आंखें खोली। नजमा गले लग कर फफक पड़ी। बोली माफी के तो लायक नहीं हैं, लेकिन क्या अपनी जिंदगी में थोड़ी सी जगह दे सकेंगे। जिससे हम अपनी गल्तियों को सुधार सकें। शौहर साहब हम आपसे अतीत का हर पन्ना कहना चाहते थे, लेकिन जानें किस डर से कह न पाए। लेकिन आप जो भी सजा देंगे हम भुगतने को तैयार हैं। सुहैल नजमा को चुप कराते हुए बोला कैसी बातें करती हैं बेगम साहिबा रमजान पर इससे बेहतर तोहफा तो कोई हो नहीं सकता था। जो बीत गया है उसे क्यूं याद करना। जिंदगी की नई शुरूआत तो की ही जा सकती है। आप हमसें मोहब्बत करें न करें, यह आपका हक है। लेकिन हम आपसे बेपनाह प्यार करते हैं। इसकी तो मनाही नहीं होनी चाहिए। इस बार मुस्कुराते हुए सुहैल ने नजमा को अपनी बांहों में ले लिया।

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