Thursday, August 9, 2018

.....दो सितारों का जमीं पर है मिलन आज की रात


देखों बरसात आई तो तुम भी करीब आ गए। यूं लगता है कि अब हमारा मिलन होकर ही रहेगा। जानते हो तुम्हें देखकर मन करता है गुनगुनाने का कि 'दो सितारों का जमीन पर है मिलन आज की रात, मुस्कुराता है उम्मीदों का चमन आज की रात।' झील मुस्कुरा रही थी और बादल को देखकर अपने मन ही मन में बातें किए जा रही थी। अभी उसके चेहरे पर लहरों की मुस्कुराहट तैरी ही थी कि अचानक से चली बोट ने उसे अंदर तक झकझोर दिया। और उसे याद आई बीतीं बातें । झील फिर से खुद से बातें करने लगी तुमसे बिछड़े हुए कई महीनें हो गए। इस दौरान तुम्हें भूलने की लाख कोशिशें की। कभी तमाम रातें जाग कर मैंनें लहरों की अठखेलियों पर मुस्कुरा कर जीने की कोशिश की तो कभी शांत होकर मैंने खुद के खालीपन को भरने के लिए अपनी गहराई को मांपना चाहा। हालांकि उस दौरान भी आसमान पर तुम मुझे नजर आते थे। कभी बारिशों को खुद में समेटे हुए तो कभी गरजकर यूं जताते कि जैसे अभी ही मुझसे लिपट जाओगे और बरस जाएगीं बूंदें तुम्हारी मोहब्बत की। 
........लेकिन तुम्हारी तमाम कोशिशों के बावजूद मैंने तुम्हारी राह तकनी छोड़नी दी थी। मैंने तुमसे हर रिश्ता खत्म कर लिया था और मौसम भी मेरे साथ था। तभी तो तुम दूर मुझे आसमान पर टके नजर आते थे। जिसके होने न होने का अर्थ मेरे लिए बेमानी था। इस तरह कई महीने बीत गए। अब तो लहरों और नावों के साथ मेरी अच्छी दोस्ती हो गई थी। और तो और मेरा सफर करने आने वाले सैलानी जब मुझे छूकर अपनी तस्वीरें खिंचवातें तो मुझे खुद पर बड़ा गुमां होता था। मैं इतराती थी, इठलाती थी और उनके सफर को और भी रोमांचक और खूबसूरत बनाने के लिए अक्सर मचल सी जाती थी। तब नाविक कहता था कि धारा तो बिल्कुल हमारे ही संग हो ली है जैसे। फिर एक दिन प्रेमी जोड़ा मेरी सैर करने आया और अपने प्रेम का साक्षी मुझे बनाने लगा। मैं मन ही मन सोच रही थी कि जिसके भीतर प्रेम ही न हो आखिर वह कैसे प्रेम का साक्षी बन सकता है। मैंने खुद को टटोला। मेरे मन के किसी कोने में दफन तुम्हारी बातें, जो अब यादें बन चुकी थीं। वो फिर से मुझपर हावी सी होने लगीं। मौसम तेजी से बदलने लगा।
............. आसमान पर फिर तुम्हारी आमद हुई अचानक से तुम्हारे गरजने की आवाज हुई फिर बारिश की हल्की-हल्की फुहारें पड़ने लगीं। आज फिर तुमने कोशिश की मेरे करीब आने की और फिर से तुमसे तारूफ हो, ऐसी कोई ख्वाहिश नहीं थी। तभी प्रेमी जोड़े आपस में गले लगकर बातें कर रहे थे कि उनकी मोहब्बत को कुदरत भी बारिश की बूंदों से आर्शीवाद दे रही है। उनपर अपना प्यार लुटा रही है। मुझे रश्क हुआ उनसे तभी लहरों ने मुझसे कहा कि झील ये बूंदें तो जानें कब से तेरी हैं सिर्फ तेरी और अब और इनसे जुदा मत रहो। उसने कहा समेट लो इसे अपने आगोश में क्योंकि यह बादल तुम्हारा है और जानती हो... कि जिनसे मिलने की तमन्ना हो वही आते हैं, चांद-तारे तेरी राहों में बिछे जाते हैं, चूमता है तेरे कदमों को गगन आज की रात...... लहरों का ये कहना था और तुम मेरे करीब आकर झूमकर बरसे तो यूं लगा जैसे दो सितारों का जमीं पर है मिलन आज की रात......

4 comments:

  1. Wahh...
    Bahut hi Sundar lekh hai.
    Padte waqt LGA ki purani yaado ka hawa ka jhhoke chhu kr nukal gya..

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  2. वाह,अतिसुन्दर
    शब्द शब्द दिल को छू गया

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