....सब बंद है आजकल। सड़कों पर सन्नाटा पसरा है, दूर-दूर से आती वो हॉर्न, कभी आपस में टकरा जाने से सॉरी या देखकर नहीं चल सकते जैसी आवाजें भी कहीं गुम हैं। सुबह-दोपहर या शाम कभी भी बेअंदाज़ चलने वाली हवाएं भी जैसे ठहर गयीं हैं। मेरे घर के बाहर लगे कदंब की शाखों पर बैठने वाले परिन्दों की चहचहाहट भी कहीं गुम है। ये सब कुछ जो आज बंद है, कभी ऐसा ही परिदृश्य देखने की कल्पना थी। मने सबकुछ शांत हो दूर-दूर तक शोर न हो। लेकिन जब यह कल्पना साकार हुई तो जाना कि शोर की भी अपनी अहमियत है। ये जिंदगी का वो हिस्सा है जिसके बिना कुछ नहीं बहुत कुछ अधूरा है। हालांकि ये सब बंद हमारे फिट रहने के लिए ही तो है। लेकिन शोर का लॉकडाउन शायद परिंदो को भी तकलीफ दे रहा है तभी तो आज गौरेया का वह घोंसला कदंब की शाखा पर नहीं.... टूटकर नीचे पड़ा था। शायद परिंदे भी अपने पुराने देश लौट गए...😒
उम्मीद है ये बंद कोरोना जैसी गंभीर आपदा से जल्दी ही निजात दिला देगा...और फिर शोर का लॉकडाउन भी खत्म होगा। सड़कें फिर से गुलज़ार होंगी..हवाएं फिर से गुनगुनाएँगी... परिंदे फिर से चहचहायेंगे...खामोशी के बाद आने वाला ये शोर सबके चेहरों पर मुस्कुराहट और सुकून लेकर आएगा।।।
Thursday, March 26, 2020
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