Friday, January 22, 2021

ज़िद...

ज‍िद पर हैं आज हवाएं और सर्दियों में बला की ये धूूूप
 न जानें कौन हारेगा और न जाने कौन अब जीतेगा.....


बहुत वक़्त हुआ कुछ लिखा ही नहीं .... नहीं नहीं तुम ये मत समझना कि शब्द सारे मोहब्बत के अफसाने जैसे आये-गए हो गए। बस हुआ कुछ यूं कि प्रेम का वो पिटारा जो मुझमें जीवन का संचार करता है, उसकी चाभी कहीं गुम हो गई है। लेकिन आज जब मैंने खुले आसमान पर प्रेम की जिद देखी तो रहा नहीं गया। फिर से कोशिश की उस ज़िद को शब्दों में पिरोने की। चलो फिर तुम्हें भी बताती हूं... वो ज़िद थी बादलों की... जो पूरे आसमान पर छा जाने को बेसब्र था, वो ज़िद थी सर्द हवाओं की... जो सबको छू कर गुजरने को बेताब थीं.. वो ज़िद थी सूरज की जो बादलों की ओट छोड़कर हर तरफ अपनी रंगत बिखेर देना चाहता था। हर किसी पर अपनी ज़िद सवार थी। हर कोई बस अपने मन का कर लेना चाहता था... और तलाश बस इतनी थी कि किसी एक की ज़िद थोड़ी कम पड़ जाती तो फिर दो एक साथ हो लेते औऱ प्रेम का नया स्वरूप बन जाता.. शायद एक नई परिभाषा गढ़ जाती...



Thursday, March 26, 2020

लॉकडाउन....

....सब बंद है आजकल। सड़कों पर सन्नाटा पसरा है, दूर-दूर से आती वो हॉर्न, कभी आपस में टकरा जाने से सॉरी या देखकर नहीं चल सकते जैसी आवाजें भी कहीं गुम हैं। सुबह-दोपहर या शाम कभी भी बेअंदाज़ चलने वाली हवाएं भी जैसे ठहर गयीं हैं। मेरे घर के बाहर लगे कदंब की शाखों पर बैठने वाले परिन्दों की चहचहाहट भी कहीं गुम है। ये सब कुछ जो आज बंद है, कभी ऐसा ही परिदृश्य देखने की कल्पना थी। मने सबकुछ शांत हो दूर-दूर तक शोर न हो। लेकिन जब यह कल्पना साकार हुई तो जाना कि शोर की भी अपनी अहमियत है। ये जिंदगी का वो हिस्सा है जिसके बिना कुछ नहीं बहुत कुछ अधूरा है। हालांकि ये सब बंद हमारे फिट रहने के लिए ही तो है। लेकिन शोर का लॉकडाउन शायद परिंदो को भी तकलीफ दे रहा है तभी तो आज गौरेया का वह घोंसला कदंब की शाखा पर नहीं.... टूटकर नीचे पड़ा था। शायद परिंदे भी अपने पुराने देश लौट गए...😒

उम्मीद है ये बंद कोरोना जैसी गंभीर आपदा से जल्दी ही निजात दिला देगा...और फिर शोर का लॉकडाउन भी खत्म होगा। सड़कें फिर से गुलज़ार होंगी..हवाएं फिर से गुनगुनाएँगी... परिंदे फिर से चहचहायेंगे...खामोशी के बाद आने वाला ये शोर सबके चेहरों पर मुस्कुराहट और सुकून लेकर आएगा।।।

Wednesday, January 29, 2020

अनकहा सा एक रिश्ता


मुग्धा सोफे का कवर ठीक कर रही थी कि रेडियो पर गाने का ट्रैक चेंज हुआ और 'बहुत प्यार करते हैं तुमको सनम' बजने लगा। वह ज़ोर -ज़ोर से सीमा-सीमा चिल्लाने लगी। सीमा उसके घर की मेड है। घर में मुग्धा के अलावा वह रहती है। जिसपर उसे खुद से भी ज्यादा भरोसा है कि वह घर अच्छे से संभाल लेगी और उसके लिए अदरक वाली कड़क चाय भी तो बस सीमा ही बना सकती थी। एक यही तो आदत थी जो मुग्धा में आज भी बाकी थी। या यूं कह लें कि इसी ने मुग्धा में मुग्धा को बाकी रखा था। वरना वो तो कबका पूरी तरह खत्म हो चुकी थी। वीर ने प्रेम में जो छल किया था उसके बाद उसका फिर से मुस्कुराना नामुमकिन सा था। 

खैर सीमा बिना मुग्धा से पूछे रेडियो सेट की फ्रीक्वेंसी चेंज करने लगी कि तभी मुग्धा ने कहा बंद ही कर दो इसे। सीमा ने सवाल भरी नजरों से मुग्धा की ओर देखा कि मुग्धा ने उसकी ओर देखे बिना अदरक वाली दो कप चाय की फरमाइश रख दी। सीमा भी अब समझ चुकी थी कि उसे कुछ नहीं पूछना क्योंकि मुग्धा जब बहुत तकलीफ में होती तो अदरक वाली दो कप चाय पीती। मानों चाय नहीं कोई नशा हो। सीमा किचन में चाय बनाने चली गयी और मुग्धा अपने कमरे में रखे उस साइड सोफे पर बैठ गयी जहां से बाहर सब कुछ हरा- हरा नज़र आता था। 

ये माथेरान की वो जगह थी जहां वह बरसों से अपने अतीत से निकलने की कोशिश में लगी थी। लेकिन कितना निकल पाई यह तो वह खुद भी आज तक नहीं समझ पाई। कहानियां लिखती थी मुग्धा 'अनामी' के नाम से। उसके लेखन को खूब सराहना मिलती थी मगर केवल कागज़ों और मेहनताने के रूप में। अनामी कौन है कोई नहीं जानता। सिवाय मुग्धा और सीमा के। सीमा ने कई बार कहा भी दीदी ऐसे काहे करती हो। जाओ न बाहर लोगों से मिलने , लोग आपकी लेखनी को कितना पसन्द करते हैं। आपसे मिलकर सबको अच्छा लगेगा और आपको भी। लेकिन मुग्धा पर इन बातों का कोई असर नहीं होता। जाने क्या चाहिए उसे। खैर दूर हरे पत्तों पर पड़ी बूंदों को देखकर मुग्धा अतीत में चली गयी। जब उसे ये गाना ' बहुत प्यार करते हैं तुमको सनम' बहुत पसन्द था। हो भी क्यों न आखिर वह वीर से बेइतन्हा मोहब्बत जो करती थी। यही वजह थी कि सालों बाद भी वह न उसे भुला पाई और न अपनी बेपनाह मोहब्बत को। उसे खुद से अलग करने के बाद वह पूरी तरह से टूट चुकी थी। लेकिन ऐसा न करती तो करती भी क्या। वीर अब शादीशुदा था और पिता बनने वाला था। हालांकि यह बात उसे वीर की बजाय उसके घरवालों से पता चली थी। तब मुग्धा को बहुत तकलीफ हुई थी कि ये खुशी की बात वीर ने उसे क्यों नहीं बताई। जबकि वह तो कभी वीर और उसकी पत्नी के बीच नहीं आयी। बड़ी से बड़ी परेशानी भी मुग्धा ने अकेले झेली थी। कभी वीर की कोई हेल्प नहीं ली थी। और तो और वह तो अक्सर ही वीर को कहती रहती कि वह किस तरह से अपनी पत्नी को स्पेशल फील करा सकता है। लेकिन वीर उसे कभी समझ ही नहीं पाया...

वीर कहता था कि वह बहुत इंटलैक्‍चुअल है लेकिन उसका इमोशनल होना इन सब पर भारी पड़ता है। वह अक्‍सर ही कहता था कि तुम बिना सोचे-समझें जो  दूसरों की मदद करती रहती हो न यह सही नहीं है। मुग्‍धा रिश्‍तों को रिव्‍यू करना सीखो। तभी समझ आएगा कौन अपना है कौन बस स्‍वार्थ के लिए तुमसे जुड़ा है। मुग्‍धा इन ख्‍यालों में खोई ही थी कि अचानक ठंडी हवा का एक तेज झोंका उसे अतीत से वर्तमान में ले आया। 

चेहरे पर दर्द भरी मुस्‍कान लिए मुग्‍धा सोचने लगी वीर तुम कितना सही कहते थे न, रिश्‍तों को रिव्‍यू करना चाहिए। काश! कि मैनें तुम्‍हें भी रिव्‍यू किया होता.....सबके लाख समझाने के बाद भी तुम्‍हें पागलों की तरह पूजती रही। सोचती हूं कि मुझे तुमसे सिवाय दो पल की बातों के सिवाय चाहिए ही क्‍या था? मेरे प्रेम के लिए बस थोड़ी सी इज्‍जत ही तो चाही थी कि तुम सबके सामने भी मेरा सम्‍मान कर सको। अपनी पत्‍नी के सामने भी हमारी पाक दोस्‍ती को इज्‍जत दे सको। लेकिन तुमने कहा कि और क्‍या चाहिए तुम्‍हें मेरे घरवाले मेरा इकलौता सबसे करीबी दोस्‍त और उसके परिवारवाले तुम्‍हें अच्‍छे से जानते हैं। तुम्‍हारा आना-जाना है। सब तुम्‍हें समझते हैं। लेकिन कहां वीर? किसने समझा? तुम क्‍या जानों तुम्‍हारे घरवालों ने कितनी बार मेरे आत्‍मसम्‍मान को ठेस पहुंचाई। मैंने कभी यह सोचकर न ही उनसे और न ही तुमसे कुछ कहा कि वो बड़े हैं अंजाने में हो गया होगा ऐसा। लेकिन वीर मेरे लिए मेरा आत्‍मसम्‍मान कितना जरूरी है यह बात तो तुम जानते हो न.... 

सिर्फ जरा सी ही तो बात थी बड़े चाचू के साथ... जिसने ऐसी ठेस पहुंचाई कि फिर मैंने कभी उन्‍हें चाचू कहकर नहीं बुलाया। कितनी बार उन्‍होंने मुझसे और पिता जी से माफी मांगी। हजार मिन्‍न्‍नतें कीं कि मजाक में वह ऐसा कह गये। लेकिन जब मेरे आत्‍मसम्‍मान की बात थी तो पिता जी ने भी मुझपर कोई दबाव नहीं डाला। तुम तो यह भी जानते थे न और अपनी फैमिली को भी जानते हो। याद है तुमने एक बार खुद ही कहा था कि मेरे चलते तुम्‍हारे स्‍वाभिमान को भी ठेस पहुंची है, मैं माफी मांगता हूं उन सबके लिए... कितने फरेबी थे तुम... 

हर बार माफी मांगकर अपनी गलतियां भुला देते थे। मैं बांवरी समझ ही नहीं पाई। सच कहूं तो बहुत अफसोस है कि जिंदगी के वो खूबसूरत साल मैंने यूं ही तबाह कर दिए। 
 दीदी .....चाय.... मुग्धा दीदी चाय .... 

सीमा की आवाज कानों में गूंज रही थी लेकिन गले से आवाज ही नहीं निकल पा रही थी। तभी सीमा ने कंधे पर हाथ रखकर एकदम झकझोर दिया। अब चाय पी लो दीदी। वरना फिर कहोगी ठंडी हो गई। एकदम गरमागरम चाय में मजा आता है। फिर मैं गर्म करूंगी तो टेस्‍ट नहीं आएगा। तब कहोगी दूसरी बनाओ। फिर कहोगी पहली वाली वेस्‍ट हो गई। अरे... अरे... अरे.. बस कर दादी मां.. पीती हूं चाय... 

पर एक कप ही बनाई क्‍या... नहीं दीदी, जानती हूं आपका  एक कप में कहां भला होगा? स्‍वाद भी नहीं आएगा। दूसरी भी है पर पहले जे तो पी लो। मुग्‍धा मुस्‍कुरा उठी.. तभी सीमा ने कहा मुग्‍धा दीदी एक बात पूछूं सच बताओगी। मुग्‍धा बोली ऐसा भी क्‍या है जो तुझे नहीं पता सीमा। सब तो जानती है तू मेरे बारे में... खुली किताब सी जिंदगी है, जो पन्‍ना चाहे पढ़ ले।  

सीमा ने कहा न दीदी, जे बात तो नहीं पता, अच्‍छा चल पूछ ही ले, वरना तेरे पेट में दर्द हो जाएगा। दीदी तुमने शादी काहे नहीं की। एक पल को कमरे में जैसे सन्‍नाटा पसर गया हो। मुग्‍धा एकदम शांत। चेहरे पर जैसे कोई भाव ही न हों। सीमा ने दोबारा वही सवाल किया। मुग्‍धा ने कहा कोई मिला ही नहीं जो मुझे समझ पाता। सच में दीदी। ऐसा भी क्‍या, आप तो इतनी अच्‍छी हैं, आपको कोई नहीं मिला, ये तो हो ही नहीं सकता। सच बताओ न, नहीं सीमा... तू न कुछ भी बोलती है। तभी सीमा के फोन की घंटी बजी और उधर से आवाज आई कि बेटी को तेज बुखार हो गया है। वह कुछ कहती कि मुग्‍धा बोल पड़ी तू घर जा और आराम से बच्‍ची का ध्‍यान रख। कुछ जरूरत हो तो बता देना, मैं खुद ही आ जाऊंगी। बिल्‍कुल भी परेशान मत होना। सीमा जा चुकी थी। लेकिन उसके सवाल ने आज मुग्‍धा के अतीत का एक ऐसा पन्‍ना खोला, जिसके सहारे उसने फिर से जिंदगी को जीना सीखा था।

 'माधव' हां यही नाम था उसका। मुग्‍धा जब वीर के छल से निकलने की कोशिश कर रही थी तो अंजाने में ही सही लेकिन माधव ही उसका सहारा बना था। दोनों एक साथ एक ही ऑफिस में काम करते थे। दोनों की सीटें भी अगल-बगल ही थीं। एक साथ काम करते हुए काफी वक्‍त बीत चुका था लेकिन मुग्‍धा की किसी से कोई खास बातचीत नहीं होती थी। उसे खुद भी हर किसी से बात करना कभी पसंद नहीं था। कॉलेज के दिनों में भी तो यही हाल था। हर कोई उससे बात करना चाहता था लेकिन वह सिलेक्‍टेड लोगों से ही बात करती थी। तभी कॉलेज में सब उसे तीखी मिर्ची बुलाते थे। खैर तब तो वह इन सारे कॉम्‍पलीमेंट्स को खूब इंजॉय करती थी। बिल्‍कुल अल्‍हड़ सी थी मुग्‍धा लेकिन वीर के प्रेम ने उसे अलग ही रंग दे द‍िया। डोर बेल बज रही थी। मुग्‍धा ने सोचा कि सीमा तो चली गई। अब कौन होगा... हां क्‍योंकि उसके घर सीमा के अलावा कोई नहीं आता-जाता। किसी से मिलना-जुलना उसे अब रास नहीं आता। वह केवल अपनी लेखन में ही व्‍यस्‍त रहती है।

खैर दरवाजे पर जाकर देखा तो कुछ बच्‍चे थे कैंसर रोगियों के लिए चंदा इकट्ठा कर रहे थे। मुग्‍धा ने उन्‍हें बिना अपने नाम की रसीद लिये ही दान किया और चुपचाप ही वापस आ गई। 

किचन में जाकर चाय कप में निकाली और फिर बालकनी में झूले पर आकर बैठ गई। चाय का पहला घूंट पीते ही उसे फिर से माधव से अपना अनकहा रिश्‍ता याद आ गया। उसके साथ का वक्‍त तो मन की गति से भी तेज बीत जाता था। उस वक्‍त मन करता था कि बस वक्‍त ठहर जाए। माधव वीर की तरह नहीं था लेकिन उससे कई गुना ज्‍यादा समझदार था। केवल मुग्‍धा के लिए नहीं बल्कि हर किसी को समझता था। संस्‍कारी था, भावनाओं की कद्र करता था। न मालूम कैसे वो मुग्‍धा को इतनी अच्‍छी तरह समझने लगा था। उसका साथ, उसकी बातें और उसकी समझ दोनों ही मुग्‍धा को बहुत अच्‍छी लगती थीं। लेकिन न तो यह आकर्षण था और न ही प्रेम... इस बारे में मुग्‍धा बिल्‍कुल क्लियर थी। हां माधव का साथ अच्‍छा लगता था। उसके साथ का ही असर था कि वह वीर के फरेब से बाहर निकल सकती। वरना कोशिशें तो मुग्‍धा ने कई बार की थीं लेकिन बार-बार वीर के छल में उलझ जाती थी। 

माधव का साथ इतना खूबसूरत लगता था कि कई बार तो अपना काम छोड़कर मुग्‍धा बातों में ही उलझी रहती। जानती थी वह खुद के साथ-साथ उसे भी डिस्‍टर्ब करती है। लेकिन फिर सोचती दोस्‍ती में इतना चलता है। कई बार कुछ दिनों के लिए बात करनी बंद भी कर देती। यह सोचकर की कहीं उसे माधव की आदत सी तो नहीं हो गई है। लेकिन शायद हो ही गई थी। तभी तो छुट्टियों में कभी फोन को हाथ न लगाने वाली मुग्‍धा एकाध बार तो फोन इसलिए चेक कर लेती कि शायद माधव का कोई मेसेज पड़ा हो। मुग्‍धा उसके सहारे जीने की कोशिश कर रही थी। खुद को तराशना चाह रही थी। लेकिन एक डर था उसके मन के भीतर कहीं माधव चला गया तो। ऐसी तो नहीं थी मुग्‍धा। अपने फैसलों के प्रति बिल्‍कुल फर्म रहती थी। लेकिन माधव को लेकर वह अजीब कशमकश में थी। मुग्‍धा सोचती थी कि माधव जैसा जीवनसाथी हो तो शायद जिंदगी और भी बेहतरीन हो सकती है। उसे लगता था कि जो इंसान कुछ वक्‍त में उसे इतने अच्‍छे से समझ सकता है, वह हमेशा उसका साथ देगा। कभी भी अकेले मंझदार में नहीं छोड़ेगा। उसका सम्‍मान करेगा और उसके जीवन में हमेशा ही आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करता रहेगा।..... लेकिन मुग्‍धा माधव के मन की बात नहीं जानती थी और न ही माधव जैसी समझदार थी। उसे पता था तो बस इतना कि वह माधव के लायक नहीं है। शायद यही सोचकर वह माधव से कुछ नहीं कह पाई। वरना माधव ही ऐसा था जिससे मुग्‍धा ने वीर की हर बात बड़ी सहजता से शेयर कर ली थी। बिना किसी डर और झिझक के। 

 फिर से डोर बेल बजी। मुग्धा अनमने मन से उठी और दरवाजे तक पहुँची। जैसे ही दरवाजा खोला अवाक रह गयी। दरवाजे पर माधव था.... वह चुप थी कि  माधव बोल पड़ा हेलो मैडम कैसी हैं, कहाँ खो गयीं? मुझे पहचाना नहीं क्या? मैं माधव हूं आपका मित्र। अंदर नहीं बुलाएंगी क्या??? अरे रुको तो सही एक साथ इतने सवाल फिर शुरू हो गए तुम.... चलो मतलब मैं याद हूं।। तो क्या बाहर ही बातें करोगी? अरे नहीं नहीं कैसी बात कर रहे हो। आओ न अंदर आओ।  माधव तुम इस शहर में कैसे... कुछ नहीं तुम्हें ढूंढ़ता हुआ आ गया।। अच्छा... मुग्धा  एकटक माधव को देखती रह गयी। अपने चेहरे को पोछते हुए वह बोला कुछ लगा है क्या ... आप फिर से उस दिन की तरह देखने लगीं। याद है न वह दिन, जब हम चाय पर गए थे और आप एकटक मुझे देखें ही जा रहीं थी। तब भी मैंने पूछा था पर आपने जवाब नहीं दिया था। जानता हूं आज भी नहीं देंगी। लेकिन क्या चाय भी नहीं पिलाएंगी?... 

मुग्धा बोली अरसे से किचन में नहीं गई पता नहीं कैसी बनेगी।। पर बनाती हूं... अरे आप तो अन्नपूर्णा हैं जो भी बनाएंगी वो लाजवाब ही होगा। मुग्धा मुस्कुराते हुए बोली फिर शुरू। माधव ऐसे ही मुग्धा से बातें करता था। उसपर वह कहती तो थी कि क्या बेवजह की तारीफ़ें करते हैं पर असल में उसे माधव का यह अंदाज़ बहुत अच्छा लगता था। जब कभी वह ऐसे न बात करे तो मुग्धा को अज़ीब सी बेचैनी होने लगती।... माधव छेड़ते हुए बोला चाय... चाय...

मुग्धा ने कहा तुम यहीं बैठो मैं बनाकर लाती हूं। उधर माधव साइड टेबल पर पड़ी किताब के पन्ने पलटनें लगा और मुग्धा चीनी - चायपत्ती ढूंढकर चाय बनाने लगी। दो ही मिनट बीते थे कि माधव किचन में आ गया और आवाज़ दी मुग्धा। वह पलटी तो देखा कि माधव घुटनों के बल बैठा था। इतने में ही माधव ने ज़ेब से मुग्धा की पसन्द का जैस्मिन फ्लावर निकाला और तपाक से बोल उठा मुग्धा क्या मुझसे शादी करोगी...फिर हम लोग मिलकर चाय बनाएंगे... मुग्धा मुस्कुराई और बोली तो फ्लर्ट करने की आदत आज तक है... माधव ने कहा नहीं मैं बहुत सीरियस हूं और तुम्हारे लिए ही मैंने आज तक शादी नहीं की। अच्छा....ऐसा है तो फिर मेरी भी हां....

Saturday, June 1, 2019

कहानियों में दर्ज हैं मेरे-तुम्‍हारे अहसास.... (पहला भाग)

कहानियों में दर्ज हैं मेरे-तुम्‍हारे अहसास कुछ इस तरह
पत्‍तों पर बिखरी हो मोतियों सी नम ओस की बूंदें जिस तरह......


सुहाना खिड़की पर लगे पर्दे हटा ही रही थी कि अचानक उसकी नजर बारिश की बूंदों पर पड़ी। जो बाहर गमले में लगे पेड़ों पर साफ मोती सी नजर आ रही थी। कितनी खूबसूरत लगती हैं न ये बारिश की बूंदे, पीछे से उसे रुहान ने आवाज दी। पलटते हुए सुहाना कुछ हड़बड़ाकर बोली हां बिल्‍कुल मोतियों की तरह... उसका कहना था कि रुहान उसे अपनी बाहों में समेट लेने को आगे बढ़ा लेकिन सुहाना न जाने किस धुन में अंदर चली गई।
रुहान सुहाना के पीछे-पीछे किचन में गया और कहने लगा मौसम कितना रोमांटिक है और तुम हो कि किचन में आ गई। चलो न कहीं बाहर चलते हैं आइसक्रीम खाने। तुमने ही तो बताया था कि तुम्‍हें बारिश में भीगना और आइसक्रीम खाना बहुत पसंद है। रुहान अपनी ही मस्‍ती में न जाने क्‍या-क्‍या कहे जा रहा था लेकिन सुहाना ऐसे चुप थी जैसे उसे कुछ भी सुनाई ही नहीं दे रहा हो....

रुहान ने फिर सुहाना के गले में अपनी बांहे डालते हुए कहा चलेंगी मैडम? बारिश में आइसक्रीम का लुत्‍फ उठाने... सुहाना अचानक से ख्‍यालों की दुनियां से बाहर निकली और बोली नहीं,  फिलहाल तो बिल्‍कुल नहीं.. और आपकी तो शाम को कोई मीटिंग थी न, जाना नहीं है क्‍या? शिट मैं तो भूल ही गया था। थैंक्‍स यार यू आर रियली माई स्‍वीटहार्ट... चलो आइसक्रीम न सही एक प्‍याली चाय ही पिला दो। हां बाबा ठीक है, आप रेडी हो जाइए मैं चाय बनाती हूं। अच्‍छा सुनों, अदरक जरूर डाल देना। मैडम इस बारिश में तुम्‍हारे हाथों की चाय वो भी अदरक वाली कसम से मजा आ जाता है। अच्‍छा-अच्‍छा ठीक है अब बटरिंग की इतनी भी जरूरत नहीं,  मैं चाय बना रहीं हूं।

रुहान मीटिंग के लिए निकल चुका था लेकिन सुहाना अभी तक अतीत से बाहर नहीं निकल पा रही थी। 10 साल हो गए थे उसकी और रुहान की शादी को। लेकिन अतीत का वह खाली पड़ा कोना आज तक भर नहीं पाया था। रुहान उससे बेशुमार प्‍यार करता है, लेकिन शायद ये पहली मोहब्‍ब‍त वाली कशिश है, जो भुलाए नहीं भूलती...

चाय का कप लिए सुहाना झूले पर बैठी थी। परत दर परत अतीत के पन्‍ने पलट रही थी। जब पहली बार वह और प्रणित ऑफिस साथ गए थे। हालंकि साथ तो पहले भी कई बार कॉफी पीने के लिए गए थे लेकिन बतौर दोस्‍त। उनके मन में दोस्‍ती का पैमाना कब प्‍यार तक पहुंच गया। इससे वो दोनों ही बेखबर थे। लेकिन इस बार दोनों का मिलना कुछ अलग था। रास्‍ते में बारिश शुरू होने से उनके बीच बहुत कुछ बदला।

प्रणित गाड़ी रोकने को होता तो सुहाना यह कहकर मना कर देती कि बारिश का अपना ही मजा है, धीरे-धीरे ही सही चलो.... लेकिन गाड़ी मत रोकना। प्रणित ने कहा भीग जाएंगी मैडम, सुहाना बोली तो क्‍या हुआ? नमक हैं क्‍या जो गल जाएंगे? दोनों बातें करते हुए आगे बढ़ रहे थे कि तभी अचानक से बारिश तेज हो गई। अब तो दोनों ही कहीं रुकना चाह रहे थे। लेकिन कहां, इसके लिए वह अपनी नजरें दौड़ा ही रहे थे कि सामने एक खाली पड़ा गैराज नजर आया। क्‍या करते दोनों वहीं रुक गए कि बारिश थमे तो वह वापस जाएं क्‍योंकि इतना भीगने के बाद अब दोनों ही ऑफिस तो नहीं ही जा सकते थे...

सुहाना अपने दुपट्टे से बालों को सुखाने की कोशिश कर रही थी जबकि वह पूरी तरह से भीग चुकी थी। दुपट्टा भी बारिश से तरबतर था। वहीं प्रणित अपने रुमाल से अपना चश्‍मा साफ कर रहा था। अचानक दोनों की नजरें एक-दूसरे से मिली। प्रणित और सुहाना बिना कुछ कहे करीब आए और पास पड़े गाड़ी के पहियों पर बैठ गए। कभी वह एक-दूसरे को देखते तो कभी बाहर बारिश को। लेकिन दोनों जो कुछ देर पहले बराबर बातें कर रहे थे अब उनके बीच कोई संवाद नहीं हो रहा था। अगर कुछ था बस गहन चुप्‍पी।

सुहाना ने थोड़ी कोशिश की और बोली यहां आस-पास कोई आइसक्रीम पार्लर होता तो तभी प्रणित बोल उठा अदरक वाली चाय होती तो शायद कुछ ज्‍यादा ही मजा आता, है न... लेकिन फिलहाल तो बस बारिश ही है... इतना कहकर दोनों ही चुप हो गए और एक-दूसरे को देखकर मुस्‍कुराने लगे।

प्रणित और सुहाना की मुस्‍कुराहट दोनों को एक साथ ले आई। यानी अब तक दो जो अलग-अलग पहियों पर बैठे थे वह अब एक ही पहिये पर साथ थे। बिना कुछ कहे प्रणित ने अचानक से सुहाना का हाथ पकड़ लिया। उसने भी शायद मौन स्‍वीकृति दे दी थी। तभी उसके हाथों से अपना हाथ छुड़ाने की रंचमात्र भी कोशिश नहीं की।

बारिश में भीगी सुहाना के हाथ काफी ठंडे थे लेकिन अब प्रणित के हाथों में उसके हाथ गर्माहट लिए हुए थे। बारिश थमने लगी थी लेकिन दोनों के बीच प्रेम का बीच अंकुरित हो गया था शायद। तभी तो प्रणित और सुहाना एक-दूसरे से बिना कुछ कहे एक साथ उठे और गाड़ी की ओर बढ़े। तभी प्रणित ने अपनी चुप्‍पी तोड़ी और पूछा तुम्‍हें बारिश में आइस‍क्रीम खाना पसंद है? सुहाना ने धीरे से कहा हम्‍म....

कुछ दूर जाकर प्रणित ने आइसक्रीम पार्लर के पास गाड़ी रोकी और बिना पूछे वह पाइनऐप्‍पल फ्लेवर की आइसक्रीम ले आया। उसे देखते ही सुहाना ने पहला सवाल यही पूछा आपको कैसे पता मुझे यही फ्लेवर पसंद है। प्रणित ने मुस्‍कुराकर कहा बस यूं ही... कुछ देर बाद दोनों ही अपने-अपने घर के निकल चुके थे। लेकिन आज सुहाना की जिंदगी में कुछ पलों ने मानों सबकुछ बदलकर रख दिया हो।

शाम से रात हो चुकी थी लेकिन उसकी आंखों से नींद गुम थी। वह बार-बार प्रणित का चेहरा और उसके हाथों में अपने हाथ के उस पल को याद करती और फिर मुस्‍कुरा उठती। तभी अचानक डोर बेल की आवाज आई.... सुहाना अतीत से वर्तमान में लौटी, हाथ में चाय का कप वैसे का वैसा ही था। कप साइड में रखकर वह दरवाजे पर पहुंचीं। सामने रुहान था। क्‍या हुआ इतनी देर लगा दी, कब से डोर बेल बजा रहा हूं मैडम जी। कहते हुए रुहान अंदर चला गया।

झूले पर बैठते ही चाय के कप पर नजर पड़ी तो बोला चार घंटे से तुम चाय लिए मेरा इंतजार कर रही थी... क्‍या बात है... सुहाना बोली चार घंटे, हां-हां चार घंटे, क्‍यों आपने घड़ी नहीं देखी मैडम? मैं शाम 6 बजे मीटिंग के लिए निकला था और अब रात के 10 बज चुके हैं... आप अब तक यही चाय लिए बैठी हैं... मेरे ख्‍यालों में आप इतना डूब गईं कि चाय का ख्‍याल ही नहीं रहा...बस इसी को तो प्‍यार कहते हैं मैडम... कहते हुए रुहान जोर से हंस पड़ा और सुहाना मन ही मन खुद से सवाल पूछने लगी कि वो बारिश, वो लम्‍हा, वो बातें, वो आइसक्रीम क्‍या  क्‍या थी, मोहब्‍बत या....

Saturday, October 6, 2018

चित्रकूट......

आजकल मैं ट्रिप पर हूं तो कोलकाता के सफर के बाद इस बार यात्रा की चित्रकूट की। हालांकि मैं चित्रकूट से तब से वाकिफ हूं जब मैं पांचवी कक्षा में पढ़ती थी। जानते हैं कैसे? दरअसल मेरे पापा कहानियां बहुत सुनाते हैं तो चित्रकूट की जानकारी भी कहानी के उसी खजाने का हिस्सा थी। अद्भुत..... नदी के तीरे बसे हुए मंदिर, आश्रम और इन सबको अपने आप में समेटे हुए पर्वतों की श्रृंखला। जहां तक नजर जाती है बस हरियाली ही हरियाली दिखती है। लाल-पीले, हरे-गुलाबी, नारंगी और बैंगनीं हर रंग के खिले फूल। बरबस ही सबकी नजरें अपनीं ओर खींचते हैं। जैसा मैंने सुना था बिल्कुल वैसा ही। तो इस सफर का स्पेशल क्रेडिट पापा जी को....क्यूंकि वो काफी अच्छे स्टोरी टेलर हैं। तभी तो चित्रकूट का जैसा चित्रण उन्होंने कहानियों के जरिए समझाया था, वो हूबहू वैसा ही निकला। तो इस वजह से पापा जी को बहुत शुक्रिया और आगे के सफर की कहानी......


 


..........सबसे प्राचीन तीर्थस्थलों में से एक, मंदाकिनी नदी के किनारे बसे तकरीबन 38.2वर्ग किलोमीटर के क्षेत्र में फैला हुआ और चारों ओर पर्वत की श्रृंखलाओं से घिरी आध्यात्मिक नगरी का सफर शुरू हुआ कर्वी स्टेशन से। जहां से बाहर निकलते ही रामघाट के लिए टैंपों लगे रहते हैं। इनका सफर रातों-दिन चलता है। आप रात के दो बजे भी चित्रकूट पहुंचेंगे तो रामघाट के लिए आवागमन सुचारू रूप से चलता ही मिलेगा। रामघाट के बारे में ग्रंथों में उल्लेख मिलता है कि मंदाकिनी (अर्थात्, मंद गति से बहने वाली वह गंगा जो स्वर्ग में बहती है)के तीरे यह वह स्थान है, जहां प्रभु श्रीराम नित्य स्नान क्रिया करते थे। साथ ही इसी घाट पर गोस्वामी तुलसीदास की प्रतिमा और भरत मिलाप मंदिर भी स्थित है। इसके अलावा घाट से कुछ ही दूरी पर जानकी कुण्ड माता सीता (जो कि जनक की पुत्री थीं तो इसी कारण से उन्हें जानकी कहा गया) स्नान करतीं थीं, वह भी स्थित है। उसी कुंड के पास रघुवीर मंदिर और संकट मोचन मंदिर भी है। इसके अलावा घाट पर किनारे लगी सजी-संवरी नावों को भी देखते ही बनता है।
......यकीन मानिए इन स्थानों के दर्शन करना बहुत सुखद अनुभव था। साथ ही मंदाकिनी स्नान, जो कि पहली बार किया था। बहुत अलग महसूस हुआ क्यूंकि जब भी गंगा या अन्य पवित्र नदियों में स्नान या ध्यान की बात आती थी तो सबसे पहले जेहन में उसकी साफ-सफाई का सवाल तैरने लगता तो कभी मन ही नहीं किया। जबकि इससे पूर्व भी कई बार तीर्थस्थलों के दर्शन करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।  लेकिन इस बार जानें क्यूं मन खुद ही नदी के तीरे बैठने के बजाए उसके साथ हो लेने को किया। शायह यह इस पावन नदी का ही प्रताप है क्यूंकि ग्रंथों में कहा भी गया है कि यदि मनुष्य का जीवन मिला है और मंदाकिनी का स्नान नहीं किया तो नरदेह प्राप्त करने का कोई सुफल प्राप्त नहीं किया। (दूत कहै यम के नर सों, नर देह धरी न करे सतसंगा, नहिं हरि नाम लियों मुख सों, नहि तुलसी माल धरी उर अंगा।। नहिं दान करे, कबहू कर सो, नहिं तीरथ पाव धरे मतिभंगा, नर देह धरे को कहा फलु है, जो अन्हाई नहीं मन्दाकिनी गंगा।। )तो हो लिए हम मंदाकिनी के संग....लेकिन उस वक्त जो अहसास हुआ उसे बयां कर पाना थोड़ा मुश्किल है फिर भी प्रयास कर रही हूं। कुछ पलों के लिए सब सुखद था। न मन में नदी की साफ-सफाई का ख्याल आया और न ही हाइजीन का। बस नदी थी और मैं...हम दोनों के बीच था तो वो था सघन वार्तालाप जो मेरा नदी के संग था। तमाम सवालों के जवाब, जो जाने कब से उलझे थे। यूं लगा बस वही पल था जब वो सुलझे थे। मंदाकिनी की बात चल रही है तो यह जानना भी जरूरी है कि इसका उद्गम कैसे हुआ। तो मान्यता है कि महर्षि अति की सती तपस्विनी पत्नी अनुसुइयां के सतीत्व के प्रताप से ही यहीं से मंदाकिनी का उद्गम हुआ था। 
        बहरहाल उस सुखद अनुभूति के बाद बारी आती है श्री कामदगिरी पर्वत की। जो कि चित्रकूट धाम का सबसे महत्वपूर्ण अंग है। मान्यता है कि इसी पर्वत पर रघुनंदन ने अपने वनवास काल में साढ़े 11वर्ष व्यतीत किए थे। चार द्वारों वाले कामदगिरी पर्वत की यूं तो भक्त परिक्रमा करते हैं, लेकिन यह भी कहा जाता है कि इस पर्वत के दर्शन मात्र से ही सारे कष्ट दूर हो जाते हैं। रामचरित मानस में कहा भी गया है 'कामदगिरी में राम प्रसादा, अवलोकत अपहरत विषादा।' यानि कि दर्शन मात्र से ही सारी तकलीफें दूर हो जाती हैं।
     ...सफर आगे बढ़ा और स्फटिक शिला के दर्शन करने का मौका मिला, जहां मर्यादा पुरूषोत्तम श्री राम माता सीता के साथ विराजमान थे और जयंत ने काग रूप धारण कर सीता के चरणों में चोंच मारी थी। उस शिला पर बैठे संत भक्तों को यह कथा सुनाते हैं और माता सीता और प्रभु श्रीराम के चरण चिन्ह की परिक्रमा करके आर्शीवाद प्राप्त करने को कहते हैं। यह स्थान भी मंदाकिनी के तीरे ही बसा है।
            यहीं कुछ दूरी पर स्थित है ऋषि अत्री की पत्नी सती अनुसुइयां का आश्रम। जहां सुहागिनों को माता के सिंदूर और चूड़ी का प्रसाद देकर सदा सुहागन का आर्शीवाद मिलता है। यही नहीं मंदिर में तमाम प्रतिमाओं के जरिए कभी त्रिदेवों को माता अनुसुइयां के पालने में दिखाया गया तो कभी माता को देवी सीता को पत्नी धर्म का उपदेश देते हुए चित्रित किया गया है। इस तरह मंदिर में प्रतिमाओं के जरिए ंिहंदू धर्म-शास्त्रों में लिखी बातों का भान कराया गया है। यह आश्रम भी मंदाकिनी नदी के तट पर बसा है। यहां औरतें पहले स्नान करतीं हैं फिर मां अनुसुइयां को चूड़ी-सिंदूर चढ़ाकर अखंड सौभाग्यवती होने का आर्शीवाद लेती हैं।
     फिर हम पहुंचे गुप्त गोदावरी जो कि शहर से 18किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। यह स्थान भी हर तरफ वनों से घिरा हुआ है। प्रवेश द्वार संकरा जरूर है लेकिन सभी भक्त आसानी से अंदर प्रवेश पा लेते हैं। यहीं गुफा के अंत में एक छोटा सा तालाब है और उसे ही गोदावरी नदी कहते हैं। मंदिर से जब आप बाहर निकलते हैं तो एक दूसरी गुफा मिलती है जो लंबी और संकरी है। इसमें जैसे-जैसे आप प्रवेश करेंगे जल का स्तर बढ़ता जाता है। गुफा के अंत तक मार्ग बेहद संकरा होता जाता है और जल घुटनों के ऊपर तक पहुंच जाता है।  खास बात यह है कि इसमें जल प्रवाह हमेशा ही बना रहता है लेकिन किसी को यह नहीं पता कि इसका उद्गम स्थल क्या है? मान्यता है कि इस गुफा के अंत में ही प्रभु श्रीराम और लक्ष्मण का दरबार लगता था।
.....एक बात जो चित्रकूट में मेरे मन को बहुत भायी कि वहां मंदिरों में दान की राशि के लिए कोई दबाव नहीं डाला जाता यानि कि कहां और कितना चढ़ाना है। आप स्वेच्छा से जितना चाहे दान कर सकते हैं। मेरी यात्रा बस यहीं तक थी और बेहद अद्भुत इसलिए थी क्यूंकि मंदाकिनी स्नान के वक्त नदी के संग जो भाव पनपा वह अवर्णनीय है। साथ ही प्रकृति का जो सौंदर्य वहां देखने को मिला वह बहुत ही सुखद है। तो रामचरित मानस के इस दोहे ’चित्रकूट की बिहग मृग बेलि बिटप तृन जाति, पुन्य पुंज सब धन्य अस कहहिं देव दिन रात...’ (चित्रकूट के पक्षी, पशु, बेल, वृक्ष, तृण-अंकुरादि की सभी जांितयां पुण्य की राशि हैं और धन्य हैं देवता दिन-रात ऐसा कहते हैं। ) के साथ मैं चित्रकूट की पावन धरती को प्रणाम करती हूं और अपनी लेखनीं को विराम देती हूं।

Monday, September 3, 2018

ये बनारस है साहब....💐

तकरीबन एक साल सात महीने पहले ही ये अंश 
लिखा जा चुका था। लेकिन अधूरे सफर के चलते इसे ब्लॉग पर साझा नहीं किया। फिर लंबे अंतराल के बाद दोस्त के साथ सफर पूरा हुआ तो सोचा कि इस अंश को भी मुकम्मल कर देना चाहिए। शुक्रिया दोस्त🙇। हालांकि बनारस का सफर अभी भी अधूरा है। लेकिन बाबा विश्वनाथ और महाकाल के दर्शन और घाट के चंद घंटों के सफर से इसे पूरा मान लिया जाए।
तंग गलियों में आस्था का ऐसा सैलाब, जो एक दूसरे से लड़ने भिड़ने का भी अहसास नहीं कराता और अगर आप किसी से लड़ भी गए तो तो बदले में आपको एक मुस्कराहट मिलेगी। यहाँ कोई किसी पर नहीं चिल्लाता। सब बस प्यार बांटते रहते हैं। ......जी ये बनारस है साहब। 
.......कुछ घण्टो की बनारस नगरी की सैर ने किसी राजकुमारी से कम अहसास नही कराया। पहुचते ही रुकने का इंतज़ाम हो चुका था, यानि कि हम कहाँ और कैसे रुकेंगे , ऐसी कोई परेशानी न थी। तो भई हो गया यहाँ तक का किस्सा।
.....फिर निकल पड़े  भोलेनाथ के दर्शन को। सुना था और देखा भी वहां जबरदस्त भीड़ , लेकिन बाबा की ऐसी कृपा कि वहां भी कुछ स्पेशल सी फीलिंग। और बस देखते ही देखते हो गए दर्शन। इसके बाद उस पवित्र जल का पान जिसके लिए मान्यता है कि पंडित जी आक्रमण के समय शिवलिंग को लेकर उसी कुंड में कूद गए थे। कहा यह भी जाता है कि कुंड के जल का पान करने से आस्था, ज्ञान और सौभाग्य में वृद्धि होती है। खैर हमारी आस्था तो पहले से ही बहुत थी और विश्व्नाथ के दर्शन के बाद और भी प्रबल हो गयी। 
इसके बाद माँ अन्नपूर्णा के दर्शन। वहां भी विशेष व्यवस्था के तहत हमारे आँचल में माँ का आशीर्वाद। सबकुछ बहुत कम समय में और बहुत आसानी से हुआ।
 महज दो घंटे में बाबा के दर्शन फिर वापसी का सफर। ये काफी रोमांचकारी रहा। तमाम सारी चीजें होने के बाद जैसे ही स्टेशन पहुँचे, ट्रेन हमारा साथ छोड़ चुकी थी। फिर क्या था पूरे दिन के सफर की थकान हँसी में गुम गई। कहानी अभी खत्म नही हुई अगली ट्रेन आ गई और हमारा सफर शुरू। जीवन में बहुत सारी यात्राएं की लेकिन ये यादगार लम्हों में से एक बन गयी। इन सबके लिए और एक राजकुमारी वाली फीलिंग के लिए दोस्त आपका शुक्रिया। क्यूंकि अपार सहयोग और स्नेह से ये यात्रा बहुत अच्छी रही।
ये सफर का पहला हिस्सा है। 
....थोड़े अंतराल के बाद किसी ज़रूरी काम से बनारस फिर जाना हुआ। जिस दिन पहुंचे उसके अगले ही दिन घाट पर जाने का मौका मिला। सोमवार का दिन था, शाम पूरी तरह ढल चुकी थी और रात की आमद थी। हम पतित पावनी गंगा के समक्ष थे और मन में उलझनों की हज़ार तरंगें थीं। जो माँ गंगा के स्पर्श मात्र से धीरे-धीरे शांत होती प्रतीत हो रही थी। मन को शांत पाकर कुछ पलों के लिए गंगा की लहरों पर एकाग्र होकर खुद को पूरी तरह पतित पावनी को समर्पित कर दिया। ताकि विचारों का आवागमन थमें और खुद के साथ कुछ वक्त बिता सकूं। 
....यकीन जानिये ऐसा ही हुआ। मन पूरी तरह से आज़ाद था, किसी परेशानी या उलझन की कोई जद्दोजहद भी नहीं थी। चेहरे पर मुस्कुराहट थी और आँखों मे चमक। तमाम सवालों के जवाब मिल चुके थे। खुद के ही विरोध में खड़ी मैं अब मुस्कुरा रही थी और शायद बनारस जाना सार्थक हो चुका था कि तभी फ़ोन की घंटी ने मेरी तंद्रा तोड़ी। घड़ी में 11 बज रहे थे। रूम पर जल्दी पहुँचने का नियम टूट चुका था। लेकिन बनारस में खुद से मुलाकात भी हो चुकी थी...... इस बार के बनारस के सफर में काल भैरव के दर्शनों का भी सौभाग्य प्राप्त हुआ। तो इस तरह बतौर राजकुमारी शुरू हुआ बनारस का सफर अब मुकम्मल कब होगा या नहीं होगा? पता नहीं लेकिन अब तक के सफर की कहानी यहीं मुकम्मल होती है। 😊

Saturday, August 25, 2018

कोलकाता के सफर में स्वाद-ए-बनारस बाटी-चोखा

....कौन कहता है कि जगह बदले तो खानपान बदलता है। स्वाद बदलता है या फिर खाने का अंदाज बदलता है। बनारस से 680 किलोमीटर दूर कोलकाता में बनारस का स्वाद लोगों की जुबान पर चढ़कर बोलता है।
वेजेटेरियन ही नहीं नॉन वेजेटेरियन भी बनारसी बाटी चोखा को ढूढते हुए वहां पहुंचते
हैं और फिर वीक ऑफ पर खाने को लेकर वही उनकी फेवरेट जगह होती है। यकीन जानिए जब मैं वेज खाने की तलाश में गूगल कर रही थी और बाटी चोखा रेस्टोरेंट का नाम देखा तो मन किया जाकर देखते हैं। और फिर सवाल प्योर वेज खाने का भी था। लेकिन खाने का वही टेस्ट होगा लखनऊ या फिर वाराणसी वाला सोचा नहीं था। जैसे ही हमारी नजर बाटी चोखा रेस्टोरेंट पर पड़ी, चेहरे पर मुस्कान अपने आप तैर गई। हो भी क्यूं न वही लुक वहीं अंदाज। फिर भी खाने के उसी टेस्ट को लेकर जरा सोच में थी। तभी दरबान ने दरवाजा खोला और बड़ी तहजीब के साथ अंदर तक ले गया। कोलकाता में भी लखनवी अंदाज दिल को छू गया। इसके बाद इंटीरियर पर नजर गई। हूबहू राजधानी और वाराणसी की शक्ल का था। फिर तो तसल्ली हो गई कि स्वाद भी वही होगा। कुछ ही देर में हमारे जाने-पहचाने अंदाज में परोसी गई बाटी और चोखा। साथ में टमाटर-मिर्च और लहसुन वाली चटनी घी के साथ। स्वाद जैसे ही जुबान तक पहुंचा, मंुह से अपने आप निकल गया अरे वाह..... लजीज बिल्कुल वहीं स्वाद। फिर तो यही अपना अड्डा बन गया। हां बस एक दिक्कत थी कि चाय यहां शाम के 7 बजने के बाद नहीं मिलती।
.......वाराणसी से शुरू हुआ कोलकाता तक पहुंचा और जल्दी ही नोएडा में भी होगी दस्तक.......कोलकाता में बनारस के स्वाद को पाकर बहुत खुशी हुई तो बस फिर क्या था हमने मैनेजर से और वहां आए लोगों से बात की। मैनेजर एसके मिश्रा जी ने बताया कि कोलकाता में बाटी-चोखा की शुरूआत वर्ष 2015 में सॉल्ट लेक फाइव-डी में हुई। पहले साल से ही लोगों का बहुत अच्छा रिस्पांस मिला है। खासतौर पर यूपी से आने वाले लोग स्पेशली बाटी चोखा ढूढ़कर वहां पहुंचते हैं। उन्होंने बताया कि स्वाद से कोई समझौता न हो, इसके लिए बाटी-चोखा के शेफ रोटेट होते रहते हैं। कभी बनारस वाले लखनऊ तो कभी कोलकाता। कुछ इस तरह से होता है स्वाद का मैनजमेंट। उन्होंने बताया कि वाराणसी, लखनऊ और कोलकाता के बाद जल्दी ही नोएडा में भी स्वाद-ए- बनारस की दस्तक होगी।  वहीं रेस्टोरेंट आए लोगों से जब बात की तो वह भी बनारस के स्वाद की तारीफ करते नहीं थके। टीसीएस में बतौर सॉफ्टवेयर काम करने वाले अयान और राजीव ने बताया कि यूं तो वे नॉन वेजेटेरियन हैं लेकिन वीकेंएड्स पर वे बाटी-चोखा ही आते हैं। अयान ने कहा कि गजब का स्वाद है इसमें। यहां का खाना खाकर सोचता हूं कि एक बार तो यूपी जरूर जाना चाहिए। बेहतरीन स्वाद है वहां के खाने में फिर चाहे यूपी का पुचका हो या फिर बाटी-चोखा। 

राज....एक रात का

पूनम    की   जिंदगी   का   बिखरा   हुआ   सच   उसके   अतीत   के   उन   दर्दनाक   पलों   में   छिपा   हुआ   है ,  जिन्हें   वह   कभी   नहीं   ...