Tuesday, November 29, 2016

एक तुम्हारी याद

एक तुम्हारी याद.... एक तुम्हारी याद जब भी आती है मुझे तन्हा कर जाती है। भीड़ में भी मैं अकेली हो जाती हूं। एक तुम्हारी याद जब भी आती है। जानते हो तुम्हारे इंतजार में न जाने कितनी रातें मैंने जागकर बिताई हैं, सुनों तुम्हे याद तो होंगे ही न वो तुम्हारे साथ बिताए हुए लम्हें, वो तुम्हें भी तो दर्द पहुंचाते होंगे। तुम्हारी भी तो आंखें नम हो जाती होंगी न, जब तुम्हें मेरी याद आती होगी। क्या जवाब दे सकोगे, क्या वो वक्त फिर लौट पाएगा जब तुम साथ थे। जानते हो जब भी ख्वाबों की तामीर बंधती है सिर्फ तुम नजर आते हो। जाग जाती हूं मैं रातों को अक्सर और फिर अपने आस-पास उसी ख्वाब को तलाशती हूं जहां तुम मेरे साथ मुस्कुरा रहे थे। लेकिन दूर-दूर तक तुम नजर नहीं आते। तुम्हारी मुस्कुराती सूरत आंखों से ओझल सी हो जाती है, जानते हो मेरी आंखें भर आती हैं, जब भी तुम्हारा ख्याल मेरे जेहन में आता है। मैं पागलों सी तुम्हें तलाशती हूं, दूर तक तुम्हें ढूढने चली जाती हूं, लेकिन फिर उसी राह पर मैं अकेली बिल्कुल तन्हा लौटती हूं। जानते हो ऐसा कब होता है जब एक तुम्हारी याद आती है। लौट आओ कि तुम्हारे जाने के बाद अब याद बहुत रूलाती हैं। तुम्हारे साथ बिताए हुए खुशी के लम्हें भी मुझे बहुत सताते हैं। बार-बार मेरी आंखों में सैलाब सा उठता है, जिन्हें जमाने में रूसवाई के डर से मैं बाहर नहीं निकलने देती। लेकिन कब तक इस सैलाब को अपने दामन में संभालूंगी अब और नहीं बर्दाश्त होता, लौट आओ न......कि तुम्हारी याद बहुत तड़पाती है।

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