Sunday, December 25, 2016

तुम्हारे इंतज़ार में


तुम्हारे साथ जिंदगी चल रही थी अच्छी भली। सुबह की दो प्याली चाय से दिन शुरू होता था। पहले एक कप चाय और दोबारा मेरे पूछने पर तुम कहते हां अब तुम्हारे हाथों की एक कप चाय और चलेगी। फिर मेरा मुस्कुराकर किचन में चले जाना। हर पल हर लम्हा खूबसूरत और जीवंत। शाम को तुम्हारे लौटने का इंतज़ार मेरे चेहरे पर झलकता था। तुम्हारी गाड़ी का हार्न सुनकर मैं दौड़ी चली आती। फिर तुम्हारी बातों के साथ दो प्याली चाय का साथ। जानते हो वो चाय चाय नहीं जैसे भागती-दौड़ती जिंदगी से चुराये जाने वाले पल थे। जिनमें मैं 'मैं' नही 'हम'थे... चाय का कप उठाने से लेकर उसे खत्म करने तक मेरी नज़रे बस तुम्हें देखती रहती थीं और तुम अखबार में गुम रहते थे। सुनों तब वह मुझे किसी सौतन से कम नही लगता था। लेकिन आज जब मैं हम नही मैं हूँ तो हर लम्हा मुझे कचोट रहा है। सासें तो चल रही हैं लेकिन मैं ज़िंदा नही हूँ, तुम्हारी बातें,तुम्हारी अदा और वो दो प्याली चाय...सब खत्म हो गया तुम्हारे इंतज़ार में...

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