Thursday, January 5, 2017

...तुम्हारी जागीर नहीं

मैं तुम्हारी जागीर नहीं.. तुम्हारी बातें तुम्हारे खत पढ़ने को मजबूर नहीं, सुनों, मैं तुम्हारी जागीर नहीं।। तुम रियासतों के मालिक हो तो रक्खो अपनी धरती तमाम, मुझे मेरी तकलीफों में ही मसर्रत है।। तुम्हारे दरबार में होंगे हज़ारों कारिन्दे, मेरा सर अपनों के दर पर झुका ही सही।। तुम होंगे नवाब ख्यालों के, होगी तुम्हारी ये कायनात, मेरे तो ख्वाबों की भी मुझपर तासीर नहीं,मैं अकेली ही सही।। सुनों, मैं तुम्हारी जागीर नहीं।। तुम जब चाहो तो मैं मुस्कुराऊँ, तुम जब चाहो तो मैं तुम्हारी हो जाऊ, नहीं ऐसा तो तुम्हारा मुझपर कोई अधिकार नहीं।। सुनों, मैं तुम्हारी कोई जागीर नहीं।।।

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