दूसरी औरत ...!
हां ठीक से याद है कुछ ऐसा ही बोला था। बल्कि यही बोला था कि वो दूसरी औरत है। मेरे बार-बार पूछने पर भी यही जवाब था उसका। बड़ी अजीब बात है इस शब्द को सुनते हुए जहां नजमा को तकलीफ हो रही थी वहीं सायरा थी जो बेबाकी से दोहराए ही जा रही थी। जानें क्यूं आज इस अकेलेपन में सायरा की बातें बेजा तकलीफ दे रहीं थीं। जेहन को लाख खंगालने पर सवाल करने के बावजूद कोई जवाब न मिला तभी सुहैल मियां आए और कमरे की खामोशी को महसूसते हुए बोले। क्या बात है आज तो घर में सन्नाटा है, लगता है कोई गायब है। चलो खैर मैं ही एक कप कॉफी का बना लेता हूं। नजमा के कानों में जैसे ही सुहैल साहब की आवाज गूंजी वो खुद को संभालने लगी और न चाहते हुए मुस्कुरा दी। बोली अरे शौहर साहब क्या फरमाइश है आपकी? नजमा प्यार से सुहैल को शौहर साहब ही बुलाती थीं। इस पर उन्होंने जवाब दिया कि कुछ नहीं आपकी खनखनाती आवाज सुनना चाहते थे। वरना कॉफी तो सरकार के लिए हम ही बनाए लाते हैं।
खैर आप हमारे ख्यालों में गुम क्यूं थीं?इक आवाज दी होती हम आपकी खिदमत में फौरन हाजिर हो जाते। नजमा मुस्कुराती हुई बोलीं अजी फिर काम कब कीजिएगा। सुहैल ने कहा काम तो होता रहेगा बेगम साहिबा। लेकिन आप कैसे इतनी जल्दी आ गईं आज? सब खैरियत से तो। जी, जी बिल्कुल सब बेहतर है। यूं ही काम जल्दी खत्म हो गया था। नजमा सोच रही थी जिस उलझन और तकलीफ को वो महसूस रही है क्या उसे सुहैल को बताना ठीक होगा। यह सोचते हुए वह किचन तक पहुंच गई और इसी उधेड़बुन में कॉफी भी बना डाली। लेकिन आज चाहकर भी किसी काम में उसका जी नहीं लग रहा था। जानें यह सायरा का गम था या बीते दिनों के कुछ पन्नें पलट गए थे, जो बार-बार नजमा को कुछ याद दिला रहे थे। जबकि वो तो सुहैल के साथ निकाह पढ़ते वक्त ही उन्हें बंद कर आई थी। महज बंद ही नहीं उन पन्नों को संदूक में बंद करके दरिया के हवाले कर आई थी। फिर आज वह बहते-बहते उसके दामन तक कैसे पहुंच गया। पांच बरस हो गए। सबकुछ बदल गया, जीने का तरीका बदल गया, मुस्कुराने की वजह बदल गई और भी वो सफेद मलमल की पोशाक का शौक भी अब तो न रहा। फिर अचानक दरिया में बहते-बहते बंद संदूक का ताला कैसे खुल गया और खुला भी तो उस तक क्यूं पहुंचा?
हैरत की बात है कि उसके पास सबकुछ बहुत करीने से आया और उसी रूप में। लेकिन यह तो अहदे-पारीना (पुराना वक्त)था। नजमा इस हिज्र (जुदाई) से कबका पीछा छुड़ा चुकी थी। अब तो उसे वस्ल (मिलन) की चाहत न थी। शिदृदत से सुहैल के साथ अपना रिश्ता निबाह रही थी। कॉफी ठंडी हो चुकी थी। अचानक नजर पड़ी तो नजमा दूसरी बनाने लगी और इस बार पूरे मन से। ताकि सुहैल के तैयार होने से पहले ही उसे दे दे। हां क्यूंकि शाम से रात होने को थी और इस वक्त दोनों ही सैर पर जाते थे। जहां टहलते-टहलते दोनों के बीच तमाम मुद्दों पर चर्चा होती। एक-दूसरे के कामकाज को समझने का शायद इससे बेहतर मौका हो ही नहीं सकता था। हां कई बार मौसम का जिक्र भी छिड़ता। लेकिन ऐसा जरा कम ही होता। क्यूंकि नजमा और सुहैल के बीच प्यार से ज्यादा इज्जत थी। दोनों एक-दूसरे के काम को समझते थे और आगे बढ़ने के लिए हौसलाअफजाई भी करतेे। लेकिन जानें क्यूं उनके बीच बेगम और शौहर वाला प्यार नहीं उमड़ता। हां जब कभी सुहैल नजमा की खूबसूरती पर कसीदे पढ़ता तो नजमा शरमां कर चली जातीं। बात यहीं तक रहती थी। इससे होता ये था कि सुहैल कुछ वक्त के लिए अकेला हो जाता और अकेलापन तो उसे काटने को दौड़ता था। नजमा से निकाह के लिए हां भी इसीलिए की थी कि वह बहुत हंसमुख और बोलने वाली लड़की थी। लेकिन निकाह के बाद तो उसे खिलखिलाकर हंसते भी नहीं देखा। बोलती जरूर थी लेकिन जब खामोश होती तो कई-कई दिनों तक सन्नाटा पसरा रहता। इसलिए सुहैल ये कोशिश करता कि नजमा को जो जैसा पसंद हो, वैसा ही करें। लेकिन वो मौका भी कहां देती थी कुछ पसंद-नापसंद पर बात करने का। तो सुहैल कामकाज की ही बातें कर लेता।
लेकिन आज नजमा बहुत बदली थी। सुहैल ने बहुत कोशिश की जानने की, जवाब फिर भी नहीं मिला तो नजमा से कॉफी का कप अपने हाथ में लेकर ऑफिस की बातें करने लगा। सुहैल पेशे सॉफ्टवेयर इंजीनियर था और नजमां काउंसलर थीं। दोनों के पेशे अलग थे। लेकिन फिर भी एक-दूसरे के बातें दिलचस्पी से सुनतें और सवाल-जवाब भी होते। सुहैल कयास लगा रहा था कि शायद काउंसिलिंग के दौरान ही कुछ हुआ है आज। कई बार कोशिश की लेकिन नजमा की खामोशी नहीं तोड़ सका। अचानक घड़ी पर नजर पड़ी, जो दस बजा रही थी। डिनर नहीं मिलेगा बेगम साहिबा। अरे हां कैसे बातें करते हैं! आज तो आपकी पसंद से बिरयानी बनाई है हमनें। दोनों ने खाना खाया और सोने चले गए। लेकिन नजमा को नींद कहां आनीं थी। दूसरी औरत उसके कानों के साथ ही जेहन में जो गूंज रहा था। कितनी सहज थी सायरा लेकिन वो क्यंू नहीं हो पा रही। नींद आंखों से कोसो दूर थी। हालांकि सुहैल सो चुका था।
....... नजमा ने उठकर अलमारी खोली। उसमें सालों से बंद एक बॉक्स को खोलकर डायरी निकाली और छत पर पहुंच गई। चांद की रोशनी में वो एक-एक पन्ना पलटती गई। यूं लग रहा था जैसे कोई उसके दिल पर बार-बार वार कर रहा हो और वह बचाने की जुगत। आंखों से आंसू बह रहे थे जो दूसरी औरत का दर्द बयां करने को काफी थे।
‘नहीं तुम मुझे नहीं छोड़ सकते। मोहब्बत करतीं हूं मैं तुमसे और तुम भी तो तुमने एक नहीं हजार बार कहा। तुम्हारे दिए हुए तोहफे, जिनके रैपर तक संभालकर रक्खें हैं मैंने। क्या वे सब झूठे थे?‘ मैंने ऐसा कब कहा और तुम मेरा हाथ क्यूं नहीं छोड़तीघ् रेहान इस कदर चीखा कि नजमा सहम सी गई और एक झटके में उसका हाथ छोड़ दिया। कहां पता था कि ये हाथ ही नहीं साथ भी छोड़ा है। रेहान उसकी पहली और आखिरी मोहब्बत था। आखिरी इसलिए क्यूंकि वो सुहैल की इज्जत तो करती थी, रिश्ते को ईमानदारी से निबाह भी रही थी। लेकिन मोहब्बत वो आज तक न कर पाई थी। जानें खुद को किस गुनाह की सजा दिए जा रही थी।
डायरी का दूसरा पन्ना पलटा जहां रेहान कह रहा था कि मोहब्बत तो ठीक है लेकिन वह उसका नहीं हो सकता। उसका हाथ पकड़ तो सकता है, थाम नहीं सकता। कुछ कदम तो चल सकता है लेकिन जिंदगी का सफर नहीं तय कर सकता। क्यूंकि वो तो पहले से ही असमत के साथ रिश्ते में बंधा था। निकाह किया था वो भी घरवालों की मर्जी से नहीं, अपनी मर्जी से, प्रेम में था असमत के संग। बेहद शदीद प्रेम में। फिर मैं क्या हूं और क्यूं शामिल हैं एक-दूसरे की जिंदगी में? क्या मैं तुम्हारा ‘एक्ट्रा मैरिटल अफेयर‘ हूं? नजमा के इस सवाल पर रेहान चुप था। बोलता भी क्या। उसकी आंखें नम थी और पन्ना तीसरा पलट चुका था।
मैं कुछ नहीं जानता। तुम्हें समझना होगा। हम वर्चुअली प्रेम में हैं। ये कैसा प्यार है और मैं नहीं मानतीं ऐसे किसी भी प्रेम को। फिर मैंने तो कभी आपको पाने की बात नहीं की। बस खोना नहीं चाहती, आप क्यूं डर जाते हैं। मैंने कब असमत का हक छीनने की बात की। मैंने कब आपसे अपने रिश्ते का सबूत मांगा। मैं समझ सकती हूं एक लड़की से उसका प्यार छीनने का दर्द। बावजूद इसके भी इतनी तल्खी रेहान क्यूं। हाथ पकड़ भर लेने पर इतनी बेरूखी। वो अब भी खामोश था और नजमा की आंखों से आंसू बहते ही जा रहे थे। उन्हें पोंछते हुए अगले पन्ने का रूख किया।
तुमने जब चाहा हम मिले। तुमने जब जैसे चाहा हम साथ रहे। जानते हो तुम्हारा होना ही मेरा गुमां था, कि तुम हो तो मैं अकेली नहीं। लेकिन तुमनें तो मुझसे मुझी को छीन लिया। मेरा वजूद बिखर जाएगा रेहान। तुम समझती क्यूं नहीं? अगर तुम्हें इस शहर में किसी ने मेरे साथ देख लिया तो लोग जानें कैसी-कैसी बातें करेंगे? कैसी बातें रेहान? कि तुम किसी दूसरी औरत के साथ थे या फिर तुम्हारी ............. कहेंगे। चुप हो जाओ नजमा, तुम पागल हो चुकी हो। नहीं अभी नहीं पागल तो पहले थी। अब तो होश में आईं हूं कि ‘मैं दूसरी औरत‘ हूं। हाहाहाहा......खिलाखिलाकर हंसी थी नजमा। शायद ये आखिरी खिलखिलाहट थी। मैं समझती हूं तुम्हारी मजबूरी रेहान काश! तुम भी समझ पाते। जा रहीं हूं हमेशा के लिए इसलिए नहीं कि तुम्हें पाना चाहूं और पा न सकूं, इसलिए क्यूंकि असमत का कोई कसूर नहीं। इसलिए भी क्यूंकि मैं तुम्हारी जिंदगी की ‘दूसरी औरत‘ हूं। अफसोस रहेगा कि कमबख्त मोहब्बत इस मोड़ पर ले आई जहां से पीछे जाने का कोई रास्ता ही नहीं। खैर तुम हमेशा खुश रहना।
...........सुनों जा रहीं हूं लेकिन क्या आज आपकी पसंद के इस सफेद मलमल के कुर्तें में मैं अच्छी नहीं लग रही थी। रेहान साहब एक आखिरी बार कॉम्पलीमेंट तो दे दीजिए कैसी लग रही हूं, तमाम दागों के साथ भी बेदाग इस सफेद मलमल के कुर्तें में। रेहान नजरंे झुकाएं खड़ा था और खुद को असमत की गुनहगार समझते हुए, आंसू बहाते हुए नजमा आगे बढ़ चुकी थी हमेशा के लिए। लेकिन जाते-जाते एक कागज का टुकड़ा छोड़कर गई। जिसपर लिखा था ‘हमें भी हिज्र का दुःख है न कुर्ब की ख्वाहिश, सुनों कि भूल चुके हम भी अहदे-पारीना‘ ये डायरी का आखिरी पन्ना था। क्यूंकि बाकी हर पन्ने पर बस एक शब्द लिखा था ‘ दूसरी औरत।‘ चांद ने धरती को अपने आगोश में ले लिया था और नजमा डायरी बंद करके अपलक उसे निहारे जा रही थी।
सोच रही थी कैसे समझाएगी कल सायरा को। हां कल ही तो उसे आने का कहा है। क्या कहेगी कि छोड़ दो आसिफ को। जबकि डिप्रेशन की हालत में भी वो बार-बार एक ही रट लगाए रखती है कि वो दूसरी औरत है तो है, लेकिन आसिफ को कभी नहीं छोड़ेगी। बावजूद इसके जब नजमा कहेगी भूल जाए वो उसको और सायरा पूछेगी क्यूंेघ् तो क्या ये कहेगी कि ‘दूसरी औरत‘ हो तुम और दूसरी औरत ‘औरत‘ नहीं होती। उसे मोहब्बत नहीं हो सकती। या उसकी मोहब्बत में कशिश की कमी है। या वो बस महज वक्त बिताने और दिल बहलाने वाली औरत है। क्या कहेगी आखिर वो सायरा से। जिससे वो डिप्रेशन से निकल आए। जबकि वो खुद पांच सालों से इसी से निकलने की तो जद्दोजहद कर रही थी। नजमा की इस उधेड़बुन में जानें कब सुबह हो गई। उसे अहसास तब हुआ जब सुहैल ने उसके कंधे पर हाथ रखकर कॉफी का मग उसकी ओर बढ़ाया। मुस्कुराते हुए उसने मग अपने पास रखा और मन ही मन खुदा से दुआ की कि ‘दिल गया था तो ये आंखें भी ले जाता कोई, मैं फकत एक ही तस्वीर कहां तक देखूं.....। ‘

हां ठीक से याद है कुछ ऐसा ही बोला था। बल्कि यही बोला था कि वो दूसरी औरत है। मेरे बार-बार पूछने पर भी यही जवाब था उसका। बड़ी अजीब बात है इस शब्द को सुनते हुए जहां नजमा को तकलीफ हो रही थी वहीं सायरा थी जो बेबाकी से दोहराए ही जा रही थी। जानें क्यूं आज इस अकेलेपन में सायरा की बातें बेजा तकलीफ दे रहीं थीं। जेहन को लाख खंगालने पर सवाल करने के बावजूद कोई जवाब न मिला तभी सुहैल मियां आए और कमरे की खामोशी को महसूसते हुए बोले। क्या बात है आज तो घर में सन्नाटा है, लगता है कोई गायब है। चलो खैर मैं ही एक कप कॉफी का बना लेता हूं। नजमा के कानों में जैसे ही सुहैल साहब की आवाज गूंजी वो खुद को संभालने लगी और न चाहते हुए मुस्कुरा दी। बोली अरे शौहर साहब क्या फरमाइश है आपकी? नजमा प्यार से सुहैल को शौहर साहब ही बुलाती थीं। इस पर उन्होंने जवाब दिया कि कुछ नहीं आपकी खनखनाती आवाज सुनना चाहते थे। वरना कॉफी तो सरकार के लिए हम ही बनाए लाते हैं।
खैर आप हमारे ख्यालों में गुम क्यूं थीं?इक आवाज दी होती हम आपकी खिदमत में फौरन हाजिर हो जाते। नजमा मुस्कुराती हुई बोलीं अजी फिर काम कब कीजिएगा। सुहैल ने कहा काम तो होता रहेगा बेगम साहिबा। लेकिन आप कैसे इतनी जल्दी आ गईं आज? सब खैरियत से तो। जी, जी बिल्कुल सब बेहतर है। यूं ही काम जल्दी खत्म हो गया था। नजमा सोच रही थी जिस उलझन और तकलीफ को वो महसूस रही है क्या उसे सुहैल को बताना ठीक होगा। यह सोचते हुए वह किचन तक पहुंच गई और इसी उधेड़बुन में कॉफी भी बना डाली। लेकिन आज चाहकर भी किसी काम में उसका जी नहीं लग रहा था। जानें यह सायरा का गम था या बीते दिनों के कुछ पन्नें पलट गए थे, जो बार-बार नजमा को कुछ याद दिला रहे थे। जबकि वो तो सुहैल के साथ निकाह पढ़ते वक्त ही उन्हें बंद कर आई थी। महज बंद ही नहीं उन पन्नों को संदूक में बंद करके दरिया के हवाले कर आई थी। फिर आज वह बहते-बहते उसके दामन तक कैसे पहुंच गया। पांच बरस हो गए। सबकुछ बदल गया, जीने का तरीका बदल गया, मुस्कुराने की वजह बदल गई और भी वो सफेद मलमल की पोशाक का शौक भी अब तो न रहा। फिर अचानक दरिया में बहते-बहते बंद संदूक का ताला कैसे खुल गया और खुला भी तो उस तक क्यूं पहुंचा?
हैरत की बात है कि उसके पास सबकुछ बहुत करीने से आया और उसी रूप में। लेकिन यह तो अहदे-पारीना (पुराना वक्त)था। नजमा इस हिज्र (जुदाई) से कबका पीछा छुड़ा चुकी थी। अब तो उसे वस्ल (मिलन) की चाहत न थी। शिदृदत से सुहैल के साथ अपना रिश्ता निबाह रही थी। कॉफी ठंडी हो चुकी थी। अचानक नजर पड़ी तो नजमा दूसरी बनाने लगी और इस बार पूरे मन से। ताकि सुहैल के तैयार होने से पहले ही उसे दे दे। हां क्यूंकि शाम से रात होने को थी और इस वक्त दोनों ही सैर पर जाते थे। जहां टहलते-टहलते दोनों के बीच तमाम मुद्दों पर चर्चा होती। एक-दूसरे के कामकाज को समझने का शायद इससे बेहतर मौका हो ही नहीं सकता था। हां कई बार मौसम का जिक्र भी छिड़ता। लेकिन ऐसा जरा कम ही होता। क्यूंकि नजमा और सुहैल के बीच प्यार से ज्यादा इज्जत थी। दोनों एक-दूसरे के काम को समझते थे और आगे बढ़ने के लिए हौसलाअफजाई भी करतेे। लेकिन जानें क्यूं उनके बीच बेगम और शौहर वाला प्यार नहीं उमड़ता। हां जब कभी सुहैल नजमा की खूबसूरती पर कसीदे पढ़ता तो नजमा शरमां कर चली जातीं। बात यहीं तक रहती थी। इससे होता ये था कि सुहैल कुछ वक्त के लिए अकेला हो जाता और अकेलापन तो उसे काटने को दौड़ता था। नजमा से निकाह के लिए हां भी इसीलिए की थी कि वह बहुत हंसमुख और बोलने वाली लड़की थी। लेकिन निकाह के बाद तो उसे खिलखिलाकर हंसते भी नहीं देखा। बोलती जरूर थी लेकिन जब खामोश होती तो कई-कई दिनों तक सन्नाटा पसरा रहता। इसलिए सुहैल ये कोशिश करता कि नजमा को जो जैसा पसंद हो, वैसा ही करें। लेकिन वो मौका भी कहां देती थी कुछ पसंद-नापसंद पर बात करने का। तो सुहैल कामकाज की ही बातें कर लेता।
लेकिन आज नजमा बहुत बदली थी। सुहैल ने बहुत कोशिश की जानने की, जवाब फिर भी नहीं मिला तो नजमा से कॉफी का कप अपने हाथ में लेकर ऑफिस की बातें करने लगा। सुहैल पेशे सॉफ्टवेयर इंजीनियर था और नजमां काउंसलर थीं। दोनों के पेशे अलग थे। लेकिन फिर भी एक-दूसरे के बातें दिलचस्पी से सुनतें और सवाल-जवाब भी होते। सुहैल कयास लगा रहा था कि शायद काउंसिलिंग के दौरान ही कुछ हुआ है आज। कई बार कोशिश की लेकिन नजमा की खामोशी नहीं तोड़ सका। अचानक घड़ी पर नजर पड़ी, जो दस बजा रही थी। डिनर नहीं मिलेगा बेगम साहिबा। अरे हां कैसे बातें करते हैं! आज तो आपकी पसंद से बिरयानी बनाई है हमनें। दोनों ने खाना खाया और सोने चले गए। लेकिन नजमा को नींद कहां आनीं थी। दूसरी औरत उसके कानों के साथ ही जेहन में जो गूंज रहा था। कितनी सहज थी सायरा लेकिन वो क्यंू नहीं हो पा रही। नींद आंखों से कोसो दूर थी। हालांकि सुहैल सो चुका था।
....... नजमा ने उठकर अलमारी खोली। उसमें सालों से बंद एक बॉक्स को खोलकर डायरी निकाली और छत पर पहुंच गई। चांद की रोशनी में वो एक-एक पन्ना पलटती गई। यूं लग रहा था जैसे कोई उसके दिल पर बार-बार वार कर रहा हो और वह बचाने की जुगत। आंखों से आंसू बह रहे थे जो दूसरी औरत का दर्द बयां करने को काफी थे।
‘नहीं तुम मुझे नहीं छोड़ सकते। मोहब्बत करतीं हूं मैं तुमसे और तुम भी तो तुमने एक नहीं हजार बार कहा। तुम्हारे दिए हुए तोहफे, जिनके रैपर तक संभालकर रक्खें हैं मैंने। क्या वे सब झूठे थे?‘ मैंने ऐसा कब कहा और तुम मेरा हाथ क्यूं नहीं छोड़तीघ् रेहान इस कदर चीखा कि नजमा सहम सी गई और एक झटके में उसका हाथ छोड़ दिया। कहां पता था कि ये हाथ ही नहीं साथ भी छोड़ा है। रेहान उसकी पहली और आखिरी मोहब्बत था। आखिरी इसलिए क्यूंकि वो सुहैल की इज्जत तो करती थी, रिश्ते को ईमानदारी से निबाह भी रही थी। लेकिन मोहब्बत वो आज तक न कर पाई थी। जानें खुद को किस गुनाह की सजा दिए जा रही थी।
डायरी का दूसरा पन्ना पलटा जहां रेहान कह रहा था कि मोहब्बत तो ठीक है लेकिन वह उसका नहीं हो सकता। उसका हाथ पकड़ तो सकता है, थाम नहीं सकता। कुछ कदम तो चल सकता है लेकिन जिंदगी का सफर नहीं तय कर सकता। क्यूंकि वो तो पहले से ही असमत के साथ रिश्ते में बंधा था। निकाह किया था वो भी घरवालों की मर्जी से नहीं, अपनी मर्जी से, प्रेम में था असमत के संग। बेहद शदीद प्रेम में। फिर मैं क्या हूं और क्यूं शामिल हैं एक-दूसरे की जिंदगी में? क्या मैं तुम्हारा ‘एक्ट्रा मैरिटल अफेयर‘ हूं? नजमा के इस सवाल पर रेहान चुप था। बोलता भी क्या। उसकी आंखें नम थी और पन्ना तीसरा पलट चुका था।
मैं कुछ नहीं जानता। तुम्हें समझना होगा। हम वर्चुअली प्रेम में हैं। ये कैसा प्यार है और मैं नहीं मानतीं ऐसे किसी भी प्रेम को। फिर मैंने तो कभी आपको पाने की बात नहीं की। बस खोना नहीं चाहती, आप क्यूं डर जाते हैं। मैंने कब असमत का हक छीनने की बात की। मैंने कब आपसे अपने रिश्ते का सबूत मांगा। मैं समझ सकती हूं एक लड़की से उसका प्यार छीनने का दर्द। बावजूद इसके भी इतनी तल्खी रेहान क्यूं। हाथ पकड़ भर लेने पर इतनी बेरूखी। वो अब भी खामोश था और नजमा की आंखों से आंसू बहते ही जा रहे थे। उन्हें पोंछते हुए अगले पन्ने का रूख किया।
तुमने जब चाहा हम मिले। तुमने जब जैसे चाहा हम साथ रहे। जानते हो तुम्हारा होना ही मेरा गुमां था, कि तुम हो तो मैं अकेली नहीं। लेकिन तुमनें तो मुझसे मुझी को छीन लिया। मेरा वजूद बिखर जाएगा रेहान। तुम समझती क्यूं नहीं? अगर तुम्हें इस शहर में किसी ने मेरे साथ देख लिया तो लोग जानें कैसी-कैसी बातें करेंगे? कैसी बातें रेहान? कि तुम किसी दूसरी औरत के साथ थे या फिर तुम्हारी ............. कहेंगे। चुप हो जाओ नजमा, तुम पागल हो चुकी हो। नहीं अभी नहीं पागल तो पहले थी। अब तो होश में आईं हूं कि ‘मैं दूसरी औरत‘ हूं। हाहाहाहा......खिलाखिलाकर हंसी थी नजमा। शायद ये आखिरी खिलखिलाहट थी। मैं समझती हूं तुम्हारी मजबूरी रेहान काश! तुम भी समझ पाते। जा रहीं हूं हमेशा के लिए इसलिए नहीं कि तुम्हें पाना चाहूं और पा न सकूं, इसलिए क्यूंकि असमत का कोई कसूर नहीं। इसलिए भी क्यूंकि मैं तुम्हारी जिंदगी की ‘दूसरी औरत‘ हूं। अफसोस रहेगा कि कमबख्त मोहब्बत इस मोड़ पर ले आई जहां से पीछे जाने का कोई रास्ता ही नहीं। खैर तुम हमेशा खुश रहना।
...........सुनों जा रहीं हूं लेकिन क्या आज आपकी पसंद के इस सफेद मलमल के कुर्तें में मैं अच्छी नहीं लग रही थी। रेहान साहब एक आखिरी बार कॉम्पलीमेंट तो दे दीजिए कैसी लग रही हूं, तमाम दागों के साथ भी बेदाग इस सफेद मलमल के कुर्तें में। रेहान नजरंे झुकाएं खड़ा था और खुद को असमत की गुनहगार समझते हुए, आंसू बहाते हुए नजमा आगे बढ़ चुकी थी हमेशा के लिए। लेकिन जाते-जाते एक कागज का टुकड़ा छोड़कर गई। जिसपर लिखा था ‘हमें भी हिज्र का दुःख है न कुर्ब की ख्वाहिश, सुनों कि भूल चुके हम भी अहदे-पारीना‘ ये डायरी का आखिरी पन्ना था। क्यूंकि बाकी हर पन्ने पर बस एक शब्द लिखा था ‘ दूसरी औरत।‘ चांद ने धरती को अपने आगोश में ले लिया था और नजमा डायरी बंद करके अपलक उसे निहारे जा रही थी।
सोच रही थी कैसे समझाएगी कल सायरा को। हां कल ही तो उसे आने का कहा है। क्या कहेगी कि छोड़ दो आसिफ को। जबकि डिप्रेशन की हालत में भी वो बार-बार एक ही रट लगाए रखती है कि वो दूसरी औरत है तो है, लेकिन आसिफ को कभी नहीं छोड़ेगी। बावजूद इसके जब नजमा कहेगी भूल जाए वो उसको और सायरा पूछेगी क्यूंेघ् तो क्या ये कहेगी कि ‘दूसरी औरत‘ हो तुम और दूसरी औरत ‘औरत‘ नहीं होती। उसे मोहब्बत नहीं हो सकती। या उसकी मोहब्बत में कशिश की कमी है। या वो बस महज वक्त बिताने और दिल बहलाने वाली औरत है। क्या कहेगी आखिर वो सायरा से। जिससे वो डिप्रेशन से निकल आए। जबकि वो खुद पांच सालों से इसी से निकलने की तो जद्दोजहद कर रही थी। नजमा की इस उधेड़बुन में जानें कब सुबह हो गई। उसे अहसास तब हुआ जब सुहैल ने उसके कंधे पर हाथ रखकर कॉफी का मग उसकी ओर बढ़ाया। मुस्कुराते हुए उसने मग अपने पास रखा और मन ही मन खुदा से दुआ की कि ‘दिल गया था तो ये आंखें भी ले जाता कोई, मैं फकत एक ही तस्वीर कहां तक देखूं.....। ‘

स्त्री की संवेदनाओं के विभिन्न स्तरों को महसूस कर लेने से हमारा आचार-व्यवहार पूर्णता की तरफ़ अग्रसर होता है...
ReplyDeleteआपकी प्रतिक्रिया सदैव मार्गदर्शन करती है। शुक्रिया सर।
Deleteकोई हाथ भी न मीलयेगा जो गले मिलोगे तपाक से. ये नये मिजाज का शहर है ज़रा फसलों से मिला करो. उम्दा उर्दू के अल्फाज से भरी ख्वतीन की जिंदगी से जद्दोजहद का फलसफा. उम्दा कारीगरी लफ्जों से. जब कभी लफ्जों का साथ न हो तो तरबीयत का नया मुकाम दरियाफ्त होता है. सुम्मा आमीन. बेहतर उम्दा.
Deleteशुक्रिया सर ।
Deleteबहुत खूब ।
ReplyDeleteक्या भाषा शैली का उपयोग हुआ है।
और कितने अच्छे तरीके से भावनाओ को दरशाया गया है।
पढते समय ऐसा लग रहा था कि मै सचमुच सब देख रहा हूँ।
बहुत खूब ।
ReplyDeleteक्या भाषा शैली का उपयोग हुआ है।
और कितने अच्छे तरीके से भावनाओ को दरशाया गया है।
पढते समय ऐसा लग रहा था कि मै सचमुच सब देख रहा हूँ।
शुक्रिया🙇
Deleteमैं पत्रकार नही हूँ मुझे ये मानने मॆ कतई गुरेज नहीँ है कि मैं पत्रकार नही हूँ। मैं अपना दो- पहिया वाहन चलाते वक्त हेलमेट पहनता हूँ, गाड़ी के कागज़ पूरे रखता हूँ, मैं किसी थानेदार, किसी विधायक, किसी मंत्री को व्यक्तिगत तौर पर नही जानता, और न ही अपनी दम पर किसी प्रकार के व्यक्तिगत या किसी को उपकृत करने के लिए कोई कार्य करने की सामर्थ्य रखता हूँ। मै किसी अधिकारी के वातानुकूलित ऑफीस मॆ बैठ के उसे भाई साहब ये हो रहा है आपको हटाने के लिये नहीँ कह पाता..... न कोई पर्ची धीरे से उसे पकड़ा पाता हूँ. हर सुबेह किसी माननीय को या शासन को कह पाता हूँ की ये ख़बर पढ़ना मैने लिखी है. हा हर रोज़ ये ज़रूर सोचता हूँ कल रहूंगा इस अख़बार के आफिस मॆ या नहीँ. कागजों से ज्यादा मुझे अब अपने तनख्वाह से प्यार है. तनख्वाह जो ज़रूरत है.जिंदगी के लिये हम जैसे के लिये. मैं अपने या किसी अन्य संस्थान के लिए कोई विज्ञापन की व्यवस्था नही करवा सकता। या किसी खबर के बदले किसी लाभ की आकांक्षा रख सकता हूँ। मैं पत्रकार बिल्कुल नही हो सकता, क्यो कि मैंने पत्रकार होने की पढ़ाई नही की है।
ReplyDeleteमैं ग्रामीण अंचलों में पेड़ों के कटान, राशन की दुकान, थानों पर फरियादियों की कतार, प्रधान कि निधि, जनपद मुख्यालय के कलेक्ट्रेट, अस्पताल, एस पी ऑफिस समेत तमाम सरकारी तंत्रों एवं जन प्रतिनिधियों से लेकर राजधानी स्थित सचिवालय,सूचना विभाग के गलियारों में घूमती खबरों को महसूस कर सकता हूँ। पर लिख नही पाता। मैं लिखता नही खबरें अब, क्यो कि अखबारी कागज़ को मेरा लिखना पसंद नही।
जब तक मैं जीवित रहा, मैं रोज मरना महसूस करता रहा। मैं मार दिया गया कुछ वर्षों पहले । जब राजधानी लखनऊ के प्रेस क्लब में पत्रकारिता का नरसंघार हुआ था। जब एक दिवंगत पूर्व मुख्यमंत्री के सुपुत्र बड़े रसूकदार नेता,उद्योगपति,बैंकर,समाजसेवी,खेल प्रेमी के खिलाफ उन्ही का पूर्व कर्मचारी सबूत लिए प्रेस कांफ्रेंस के माध्यम से अपनी बात कह रहा था। अखबारों , चैनलों के छायाकारों, कथित पत्रकारों, वकीलों ने सरे आम उसकी आवाज़ बंद कर दी, बत्तियां बुझा दी गईं, उसे खदेड़ दिया गया बाहर। मैं उसकी आवाज़ की तलवार लिए निकल चुका था अखबारी दुनिया के युद्ध में। मैं लड़ा कई दिन तक अकेला। एक शाम अगले दिन के मोर्चे की तैयारी के वक़्त मुझे अपने ही खेमे में घेर लिया गया, ताकतवर सेना के सामने जीत का सपना देख रहे मेरे सर को कलम कर दिया गया। हाँथ छोड़ दिये गए लिखने के लिए। वही लिखने के लिए जो अब पत्रकार लिखता है। मैं पत्रकार नही हूँ। नही बन पाया मैं पत्रकार। मुझे अफसोस भी नही है।
बस मेरी गलती शायद ये है जोश या सच का होश....... किसी ने सच ही कहा है... कोई हाथ भी न मीलयेगा जो गले मिलोगे तपाक से.ये नये मिजाज का शहर है ज़रा फासले से मिला करो......
मैं पत्रकार नही हूँ मुझे ये मानने मॆ कतई गुरेज नहीँ है कि मैं पत्रकार नही हूँ। मैं अपना दो- पहिया वाहन चलाते वक्त हेलमेट पहनता हूँ, गाड़ी के कागज़ पूरे रखता हूँ, मैं किसी थानेदार, किसी विधायक, किसी मंत्री को व्यक्तिगत तौर पर नही जानता, और न ही अपनी दम पर किसी प्रकार के व्यक्तिगत या किसी को उपकृत करने के लिए कोई कार्य करने की सामर्थ्य रखता हूँ। मै किसी अधिकारी के वातानुकूलित ऑफीस मॆ बैठ के उसे भाई साहब ये हो रहा है आपको हटाने के लिये नहीँ कह पाता..... न कोई पर्ची धीरे से उसे पकड़ा पाता हूँ. हर सुबेह किसी माननीय को या शासन को कह पाता हूँ की ये ख़बर पढ़ना मैने लिखी है. हा हर रोज़ ये ज़रूर सोचता हूँ कल रहूंगा इस अख़बार के आफिस मॆ या नहीँ. कागजों से ज्यादा मुझे अब अपने तनख्वाह से प्यार है. तनख्वाह जो ज़रूरत है.जिंदगी के लिये हम जैसे के लिये. मैं अपने या किसी अन्य संस्थान के लिए कोई विज्ञापन की व्यवस्था नही करवा सकता। या किसी खबर के बदले किसी लाभ की आकांक्षा रख सकता हूँ। मैं पत्रकार बिल्कुल नही हो सकता, क्यो कि मैंने पत्रकार होने की पढ़ाई नही की है।
ReplyDeleteमैं ग्रामीण अंचलों में पेड़ों के कटान, राशन की दुकान, थानों पर फरियादियों की कतार, प्रधान कि निधि, जनपद मुख्यालय के कलेक्ट्रेट, अस्पताल, एस पी ऑफिस समेत तमाम सरकारी तंत्रों एवं जन प्रतिनिधियों से लेकर राजधानी स्थित सचिवालय,सूचना विभाग के गलियारों में घूमती खबरों को महसूस कर सकता हूँ। पर लिख नही पाता। मैं लिखता नही खबरें अब, क्यो कि अखबारी कागज़ को मेरा लिखना पसंद नही।
जब तक मैं जीवित रहा, मैं रोज मरना महसूस करता रहा। मैं मार दिया गया कुछ वर्षों पहले । जब राजधानी लखनऊ के प्रेस क्लब में पत्रकारिता का नरसंघार हुआ था। जब एक दिवंगत पूर्व मुख्यमंत्री के सुपुत्र बड़े रसूकदार नेता,उद्योगपति,बैंकर,समाजसेवी,खेल प्रेमी के खिलाफ उन्ही का पूर्व कर्मचारी सबूत लिए प्रेस कांफ्रेंस के माध्यम से अपनी बात कह रहा था। अखबारों , चैनलों के छायाकारों, कथित पत्रकारों, वकीलों ने सरे आम उसकी आवाज़ बंद कर दी, बत्तियां बुझा दी गईं, उसे खदेड़ दिया गया बाहर। मैं उसकी आवाज़ की तलवार लिए निकल चुका था अखबारी दुनिया के युद्ध में। मैं लड़ा कई दिन तक अकेला। एक शाम अगले दिन के मोर्चे की तैयारी के वक़्त मुझे अपने ही खेमे में घेर लिया गया, ताकतवर सेना के सामने जीत का सपना देख रहे मेरे सर को कलम कर दिया गया। हाँथ छोड़ दिये गए लिखने के लिए। वही लिखने के लिए जो अब पत्रकार लिखता है। मैं पत्रकार नही हूँ। नही बन पाया मैं पत्रकार। मुझे अफसोस भी नही है।
बस मेरी गलती शायद ये है जोश या सच का होश....... किसी ने सच ही कहा है... कोई हाथ भी न मीलयेगा जो गले मिलोगे तपाक से.ये नये मिजाज का शहर है ज़रा फासले से मिला करो......