Tuesday, February 13, 2018

डायरी के पन्नों से .....


-------इन बिखरते पन्नों सी जिंदगी है मेरी,
न जाने कब, कौन सा पन्ना उड़ेगा
और ठहर जाएगा कुछ पल के लिए
फिर कुछ कही और कुछ अनकही बातों का दौर चलेगा।।
न जाने कब, कौन सा किस्सा फिर बनेगा नया
और ठहर जाएगी जिंदगी कुछ पल के लिए।।

कल एक अजनबी ने पढ़ा था इक पन्ना मेरी जिंदगी का
और कहने लगा वाकया एक सुनों.....
मेरी चुप्पी को मेरी हां समझकर, वो कहने लगा किस्सा फिर नया...

एक बड़ी खूबसूरत सी थी जिंदगी,
खुशियों से भरी, चाहतों से भरी, हंसती-मुस्कुराती थी वो जिंदगी,
जाने क्या ऐसा फिर अचानक हुआ, 
दिल टूटा और इक आवाज सी आयी,
और फिर खो गई वो हंसी-मुस्कुराहट, वो खुशियां, वो चाहत.....
इससे आगे की कहानी कहोगी क्या तुम?
था ये दर्द क्यूं? बदली क्यूं जिंदगी?
सोचा कह दू मैं इससे आगे का वाकया और कर दूं ये अधूरा किस्सा पूरा,
फिर सोचा बिखरे हुए पन्नों को समेटना कैसा?
वाकया जिसने छेड़ा था, उससे राब्ता कैसा?
और क्यूं कह दूं कि ये बिखरे हुए पन्नें मेरी जिंदगी के हैं...
इन बिखरते हुए पन्नों सी जिंदगी है मेरी, जिंदगी है मेरी.....

5 comments:

  1. Sir kavita mein kya accha lga?
    Shaily ya bhaav ya sudhaar ki gunjayish.

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  2. सरलता से सहजता भरे भाव बेहद खूबसूरती से लिखे हैं।।

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  3. शुक्रिया प्रशांत जी

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