कुछ पूरा और बहुत कुछ अधूरा
हर रंग जैसे उस अधूरे से मिलकर पूरे हो जाते हैं
वही जो कभी ख्वाब तो कभी ख्याल बन जाता है
कभी बहुत पास तो अमूमन बहुत दूर हो जाता है
हां वो कुछ ही पूरा है और बहुत कुछ अधूरा है
और वही अधूरा न मालूम रफ्ता-रफ्ता कब
मेरी ज़िंदगी का अरसे से खाली पड़ा कोना भर गया
औऱ फिर मुझे कुछ पूरा तो बहुत कुछ अधूरा कर गया
वो मेरे साथ कुछ यूं जिया कि
कभी बाग में जैसे संग ही मेरे फूलों और कलियों से बात करता हो।
कभी यूं कि जैसे खराब मौसम में भी बसंत की बयार लेकर आता हो।
वो ख्वाब सा है
जो कुछ पूरा और बहुत कुछ अधूरा है।
कभी देर रात आसमान पर संग तारों की गिनतियां करता हो
कभी यूं कि जैसे दिन की शुरुआत और अंत बस उस तक ही सिमट जाते हों।
वो ख्वाब सा है
कुछ पूरा और बहुत कुछ अधूरा।

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