Sunday, November 27, 2016


अनकही
हम चलते रहते हैं, कुछ छूटते रहते हैं, कहीं छूट जाते हैं। गिरते पड़ते, उठते संभलते बहुत कुछ अनकहा अनसुना, कभी बाद के लिए इत्मीनान से सोचने समझने, नए कदम रखने से पहले पुराने पन्नों के पलटने की ख्वाहिश हूक बनकर मचलती है। तब यादों में टुकड़े मिलते हैं। उन टुकड़ों को टुकड़े न होने देना बल्कि उन्हें एक सिलसिला बना लेने की चाह में इस ब्लॉग को ज़रिया बना रही हूँ। जिसका नाम है "अनकही"। हां अनकही, और जब अनकही होगी तो अनसुनी की जगह अपने आप ही बन जायेगी। रोज़ रोज़ जिंदगी के छूटे हुए एहसासों, अनुभवों का रोज़नामचा होगा ये अनकही। हां सनद रहे, इन्हें पढ़ने की मैं आज़ादी देती हूँ, पर हस्तक्षेप की नहीं।

3 comments:

  1. आपके इस सफर के अनुभवों का प्रतिदिन इंतजार रहेगा।

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